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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 13

बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग जनक के विचार को उदाहरण बनाकर चित्तके प्रशमन के उपायों का युक्तियों द्वारा विस्तारपूर्वक वर्णन |

90 verse-groups

  1. Verses 1–2श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जनक के समान अपने से आत्मा का विचार कर…
  2. Verse 3वे प्राप्तव्य वस्तु को कैसे प्राप्त करते हैं, ऐसी शंका होने पर उसे कहते है । सत्त्वगुण की…
  3. Verse 4प्रसन्न, सर्वव्यापक, इन्द्रियो को वश में करनेवाले, स्वयंज्योति परमात्मा के अपने-आप साक्षा…
  4. Verse 5उस परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होने पर अहन्ता-ममता प्रतीतिरूप हृदय ग्रन्थियाँ नष्ट ह…
  5. Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, अपनी विवेक बुद्धि से अपने को सम्पूर्ण जगत के उत्पत्ति आदि के अधिष्ठान…
  6. Verse 7अब आत्मप्रसाद के उपायों में विचार ही मुख्य है, ऐसा कहते हैं। नित्य आन्तरिक विचारवाले और ज…
  7. Verse 8विचार की जड़ भी पुरुष प्रयत्न ही है, इस आशय से कहते हैं। संसार से भयभीत हुए पुरुषों का अप…
  8. Verse 9यदि कोई शंका करे कि भाग्यवश स्वयं ही समय आने पर ज्ञान हो ही जायेगा ? हमारे प्रयत्न से क्य…
  9. Verse 10परम विवेक का अवलम्बन कर आत्मा का अपने आप साक्षात्कार कर वैराग्य से वृद्धि को प्राप्त हुई…
  10. Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, जनक की आख्यायिका के उदाहरण से विस्तारित, आकाश से फलपतन के तुल्य यह ज्…
  11. Verse 12जैसे प्रातःकाल में कमल विकास को प्राप्त होता है, वैसे ही जनक के तुल्य सद्बुद्धि ओर स्वयं…
  12. Verses 13–15जैसे धूप से जिसकी शीतलता हर ली गयी, ऐसा हिमकण गलकर लीन हो जाता है, वैसे ही यह विचित्र संस…
  13. Verse 16देह में अहंभाव का त्याग ही पूर्ण आत्मदर्शन में मुख्य साधन है, ऐसा कहते है। यह देह ही मैं…
  14. Verse 17अहंकाररूपी मेघ के नष्ट होने पर सर्वव्यापक, निर्मल चिदाकाश में आत्मप्रकाशरूपी परम सूर्य अव…
  15. Verse 18जो अहंकार की भावना है, वही तम का (अज्ञान का) मुख्य बल है, उसके शान्त होने पर प्रकाश उत्पन…
  16. Verse 19न अहन्ता है, न अन्य है ओर न तो शून्य ही है, क्योकि दोनों का साक्षी विद्यमान है, इस प्रकार…
  17. Verse 20उपादेय (ग्राह्य) विषयों मे मन का अनुराग ओर हेय (त्याज्य) विषयों मे मन का द्वेष ही पुरुष क…
  18. Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, हेय वस्तुओं के प्राप्त होने पर आप खिन्न न होइये ओर उपादेय वस्तुओं मेँ…
  19. Verse 22जिन लोगों की, यह उपादेय है, यह हेय है, ऐसी अवस्था सर्वत्र अहेय आत्ममात्र के दर्शन से विली…
  20. Verse 23जब तक चित्त से हेय ओर उपादेय की कल्पना क्षीण नहीं हई, तब तक जैसे मेघाच्छन्न आकाश में चाँद…
  21. Verse 24यह वस्तु खराब है इसलिए त्याज्य है, यह वस्तु उत्तम है इसलिए ग्राह्य है, इस प्रकार जिसका मन…
  22. Verse 25यह वस्तु मेरे अनुकूल हे अतः यह मुझे प्राप्त हो, इस प्रकार लाभ से विलासित होनेवाली ओर यह व…
  23. Verse 26उस पुरुष मे समता और स्वच्छता की संभावना में क्या विरोध है, ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं। अ…
  24. Verse 27इच्छित, अनिच्छित की आशंकारूपी चंचल वानरियाँ जिस पुरुष के चित्तरूपी वृक्ष पर स्फुरित होती…
  25. Verses 28–30अब जीवन्मुक्त पुरुष के लक्षणभूत पन्द्रह गुणों को कहते हैं। निराशता, निर्भयता, नित्यता, सम…
  26. Verses 31–33इस समय उक्त गुणों के अर्जन में उपाय का उपदेश देते हैं। जैसे बह रहे जल को बाँध से रोकते है…
  27. Verses 34–36हे सौम्य, चिर अभ्यास से दृढ़ हुए एकात्मस्थिरतारूप चित्त धेर्य से सम्पन्न अतएव अनादिकाल से…
  28. Verse 37यदि कोई शंका करे कि पहले से सिद्ध मन का उक्त उपाय द्वारा विनाश होने पर भी भावी मनोवृत्ति…
  29. Verse 38चित्त ओर चेत्य इन दोनों के विस्मरण में उनके ऊपर आस्था का त्याग ही उपाय है, ऐसा कहते हैं ।…
  30. Verse 39आस्था का त्याग करने पर समता भी सिद्ध होती है, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, समता का प…
  31. Verse 40जैसे महेश्वर पृथ्वी आदि अष्टमूर्तिरूप लिंगों को शुद्ध चिन्मात्रदृष्टि से नहीं धारण करते औ…
  32. Verse 41नान्योऽतोऽरित द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता । (इससे अन्य द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य श्रोत…
  33. Verses 42–48यदि मैंने ही इसका विस्तार किया है, तो इसमें मेरे हर्ष-क्रोध से होनेवाले दोष क्यो होते हैं…
  34. Verse 49इस प्रकार मन असत्कल्प है, यह बात सिद्ध हुई, यह एक अद्वितीय आत्मा का विस्मरण कर, उसकी जगत…
  35. Verse 50मन की प्रकाशशक्ति के समान स्पन्दनशक्ति भी चित्‌ के अधीन है, ऐसा कहते है । जो जड़ मन शव के…
  36. Verse 51अतएव चित्‌ में स्पन्दन कल्पना है, वही मन है, ऐसा विद्वानों का प्रतिवाद है यह कहते है । यह…
  37. Verse 52स्पन्दशक्ति के ही विलास चित्त और चित्तवृत्तियाँ हैं, ऐसा कहते हैं। जो चित्तरूपी साँप का फ…
  38. Verse 53इससे सिद्ध हुआ कि वित्‌ का चेत्य त्याग ही ब्रह्मतारूप से पर्यवसन्न होना है, ऐसा कहते हैं।…
  39. Verse 54काल द्वारा मनन से यह कलना मन होती है, ऐसा कहते हैं। जो सच्चिदानन्दरूप है, वही कलना बन कर…
  40. Verse 55नित्य अनुभवस्वभाव ब्रह्म का स्वरूपविस्मरण होने पर कलना ही स्मृतिता को और चित्तता को प्राप…
  41. Verse 56अतीत विषयों के आकार की कल्पना से चित्तता के समान अनागत विषयो के आकार की कल्पना से संकल्प-…
  42. Verse 57वह चिति ही अपनी मायाशक्ति से जगत्ता को मानों प्राप्त हुई है। जब तक गुरु, शास्त्र और विचार…
  43. Verse 58इसलिए शास्त्रविचार से, उत्कृष्ट वैराग्य से ओर इन्द्रियों के निग्रह से कलना को कलनारूप जो…
  44. Verses 59–60शास्त्रजन्यज्ञान से, शम आदि साधनयुक्त मनन ओर निदिध्यासनं से प्रबुद्ध हुई सब लोगों की कलना…
  45. Verse 61यदि कोई शंका करे कि कलना यदि सोई है, तो जगत को कैसे जानती है अथवा जानने पर प्रसिद्ध चित्स…
  46. Verse 62विषयांश का त्याग करने पर बची हुई कलना ही आत्मा है, ऐसा कहने पर वृत्तिज्ञान ही आत्मा है, ऐ…
  47. Verse 63यदि वह सर्वसाक्षिणी है, तो तत्‌ तत्‌ अन्तःकरण धर्मो को ही क्यो प्रकाशित करती है, सबको क्य…
  48. Verse 64हे श्रीरामचन्द्रजी, पाषाणतुल्य, जड कलना जैसे पद्मिनी धूप से प्रबोधित होती हे वैसे ही परम…
  49. Verse 65जो नैयायिक आदि नित्य साक्षी को न जानते हुए पर प्रकाश्य अनित्य ज्ञान को ही अर्थप्रकाशक मान…
  50. Verse 66अचेतन अन्तःकरणवृत्ति आदि मे नित्यचित्‌ की सन्निधि के अभाव में विषयोन्मुख प्रवृत्ति ही नही…
  51. Verses 67–68खून से लथपथ शरीरवाले मुर्दे कहाँ दौड, वन के पत्थर के टुकड़ों ने कहाँ मधुर गीत गाया ? पुरु…
  52. Verse 69पत्थर के तुल्य जड, मिथ्या भ्रमो से उत्पन्न मृगतृष्णामय इन मनों से कहाँ क्रिया की जाती हे ?
  53. Verse 70नित्यचिदात्मा का यदि स्वीकार न किया जाय, तो कलना आदि के अध्यास की सिद्धि ही नहीं होगी, ऐस…
  54. Verse 71चित्‌ की परिच्छिन्न स्यन्दकल्पना ही मन है, ऐसा पहले कहा गया है, अब चित्‌ ओर अचित्‌ अंश का…
  55. Verse 72पूर्वोक्त प्राणशक्ति संकल्प से उत्पन्न हुई है, संकल्परहित योगियों की चिदात्मरूप ही वह पृथ…
  56. Verse 73वही "यह मैं हूँ” "यह मेरा है” इस प्रकार जब विषयों की कल्पना करती है, तब स्पन्द के बिना उस…
  57. Verse 74इसी प्रकार और भी उसकी संज्ञाएँ परसिद्ध हैं, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, असत्‌ संकल्…
  58. Verse 75क्यों परमार्थतः नहीं हैं ? ऐसा यदि कोड कहे, तो इस पर कहते हैं। चूँकि परमार्थतः न मन है, न…
  59. Verse 76यदि आत्मा ही है, तो वह क्यो नहीं प्रतीत होता अथवा जगद्रूप से कौन प्रतीत होता है ? ऐसी शंक…
  60. Verses 77–78कैसे वह नहीं-सा है और कैसे है ही, यह निश्चय हुआ ? इस पर कहते हैं। स्वच्छ होने के कारण चक्…
  61. Verse 79स्थूलता आदि के अभाव से अन्य इन्द्रियाँ उसमें भले ही प्रवृत्त न हों / पर मन तो सूक्ष्म होन…
  62. Verses 80–81अपनी उत्पत्ति का विरोधी होने से भी मन की आत्मदर्शन में शक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं। परम प…
  63. Verse 82इसलिए संकल्प चित्त की उत्पत्ति में बीज है, यह हम बहुत बार कह आए है, ऐसा कहते हैं। संसार क…
  64. Verse 83यदेतत्स्यन्दितं नाम“ इत्यादि से जो विषय प्रस्तुत किया, उसका प्रयोजन कहते है । हे श्रीरामच…
  65. Verse 84प्राणरूप ही मन है, यह कैसे ज्ञात हुआ ? इस पर कहते है । जीवित पुरुष मन के दुर देशान्तर के…
  66. Verse 85इस प्रकार प्राण के निरोध से मनो-निरोध की सिद्धि के लिए दोनों की एकता का प्रतिपादन कर निरो…
  67. Verse 86अब अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणः“ इस श्रुति के अनुसार भिन्न उपादानवाले प्राण ओर मन भि…
  68. Verses 87–89तब वे शक्तियाँ किसकी है, यह आशंका होने पर कहते हैं। स्पन्दन प्राणवायु की शक्ति है, वह चलद…
  69. Verse 90चित्‌शक्ति और स्पन्दशक्ति की संगति में यह संकल्प-कल्पना निमित्त है, संकल्प-कल्पना यदि न क…
  70. Verse 91वायु की जो स्पन्दशक्ति है, वह चित्‌ से चेतन बनाई जाती है, चेत्यसहित वह चित्‌ तभी संकल्प स…
  71. Verses 92–93चित्त की यह चित्तता बाल के यक्ष के समान मिथ्या कल्पित है, क्योकि जिसमें अखण्डमण्डलाकार रू…
  72. Verse 94इसलिए सम्बन्धी न होने के कारण सम्बन्ध यहाँ नहीं है, सम्बन्ध के बिना मन किसका ओर केसे सिद्…
  73. Verse 95इस प्रकार चित्‌ और स्पन्द के भेद पक्ष मे मन की अलीकता कह कर अभेद पक्ष में तो वह सुतरां अल…
  74. Verse 96इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, दोनों पक्षो में मन का सम्भव न होने से तीनों जगतों में दुष्टात्म…
  75. Verse 97हे अनघ, अनर्थ के लिए व्यर्थ मन का संकल्प आप मत कीजिये । मन मिथ्या ही उदित हुआ है, परमार्थ…
  76. Verse 98हे महामते, कहीं पर आप अपने मन में कुछ भी संकल्प न कीजिये, क्योकि संकल्प करनेवाला मन यहाँ…
  77. Verse 99हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, सम्यक्‌ ज्ञान से आपके हृदयरूपी मरुभूमि में असम्यक्‌ ज्ञान से उ…
  78. Verses 100–101जड़ होने से ओर स्वरूपहीन होने से मन सदा ही मरा है, मरे हुए मन से लोग मारे जाते हैं, यह चक…
  79. Verse 102जिसका न स्वरूप है, न शरीर है, न कोई आधार है और न जाति ही है वह इन सबको खा डालता हे, यह बड…
  80. Verse 103जो पुरुष जड, मूक ओर अन्धे मन से भी मारा गया, वह मूढ चन्द्रमा की किरणों से जलता है, ऐसी मे…
  81. Verses 104–105विद्यमान और शत्रु को जीतने की सब सामग्री से सम्पन्न होने पर भी मूढ पुरुष अविद्यमान मन से…
  82. Verse 106महामायावी-रूप से प्रसिद्ध मयासुर का भी निर्माण करनेवाली यह माया अत्यन्त अद्‌भूत है, जिससे…
  83. Verses 107–108जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियों का भाजन होता हे, इसमें तनिक भी विवाद नहीं हे, क…
  84. Verse 109की जाती हे । भाव यह है कि अन्ध के तुल्य जड़ मन आदि की स्वभाविक मूर्खता से पीड़ित प्रपंच क…
  85. Verse 110वही जल जहाँ पर भँवरी होती है, वहो पर नीलांजन के तुल्य वर्णवाला, बीच में छेद से युक्त, पीस…
  86. Verse 111शत्रुओं से केवल देखा गया पुरुषनेत्रो से रची गई रस्सियों से मानों बोधा जाता है और संकल्प -…
  87. Verses 112–113इसलिए अत्यन्त कोमल होने के कारण यह सृष्टि कहीं पर भी स्थित नहीं हुए, व्यर्थ कल्पित, द्वित…
  88. Verse 114क्योकि उस पुरुष की बुद्धि चारों ओर से विषयों मे ही आरूढ है, उसीसे ही वह परिपूर्ण-सी स्थित…
  89. Verses 115–116वीणा की तन्त्री मधुर ध्वनि से भी यह डरती हे । निद्रायुक्तबन्धु की भी मुखकान्ति से डरती है…
  90. Verse 117अव पूर्वोक्त दुष्प्रज्ञा भले ही उरे, तथापि उसके कारण पुरुष का व्यामोह उचित नहीं है, इस प्…