Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 13
बारहवाँ सर्ग समाप्त तेरहवाँ सर्ग जनक के विचार को उदाहरण बनाकर चित्तके प्रशमन के उपायों का युक्तियों द्वारा विस्तारपूर्वक वर्णन |
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- Verses 1–2श्रीवसिष्टजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस प्रकार जनक के समान अपने से आत्मा का विचार कर…
- Verse 3वे प्राप्तव्य वस्तु को कैसे प्राप्त करते हैं, ऐसी शंका होने पर उसे कहते है । सत्त्वगुण की…
- Verse 4प्रसन्न, सर्वव्यापक, इन्द्रियो को वश में करनेवाले, स्वयंज्योति परमात्मा के अपने-आप साक्षा…
- Verse 5उस परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होने पर अहन्ता-ममता प्रतीतिरूप हृदय ग्रन्थियाँ नष्ट ह…
- Verse 6हे श्रीरामचन्द्रजी, अपनी विवेक बुद्धि से अपने को सम्पूर्ण जगत के उत्पत्ति आदि के अधिष्ठान…
- Verse 7अब आत्मप्रसाद के उपायों में विचार ही मुख्य है, ऐसा कहते हैं। नित्य आन्तरिक विचारवाले और ज…
- Verse 8विचार की जड़ भी पुरुष प्रयत्न ही है, इस आशय से कहते हैं। संसार से भयभीत हुए पुरुषों का अप…
- Verse 9यदि कोई शंका करे कि भाग्यवश स्वयं ही समय आने पर ज्ञान हो ही जायेगा ? हमारे प्रयत्न से क्य…
- Verse 10परम विवेक का अवलम्बन कर आत्मा का अपने आप साक्षात्कार कर वैराग्य से वृद्धि को प्राप्त हुई…
- Verse 11हे श्रीरामचन्द्रजी, जनक की आख्यायिका के उदाहरण से विस्तारित, आकाश से फलपतन के तुल्य यह ज्…
- Verse 12जैसे प्रातःकाल में कमल विकास को प्राप्त होता है, वैसे ही जनक के तुल्य सद्बुद्धि ओर स्वयं…
- Verses 13–15जैसे धूप से जिसकी शीतलता हर ली गयी, ऐसा हिमकण गलकर लीन हो जाता है, वैसे ही यह विचित्र संस…
- Verse 16देह में अहंभाव का त्याग ही पूर्ण आत्मदर्शन में मुख्य साधन है, ऐसा कहते है। यह देह ही मैं…
- Verse 17अहंकाररूपी मेघ के नष्ट होने पर सर्वव्यापक, निर्मल चिदाकाश में आत्मप्रकाशरूपी परम सूर्य अव…
- Verse 18जो अहंकार की भावना है, वही तम का (अज्ञान का) मुख्य बल है, उसके शान्त होने पर प्रकाश उत्पन…
- Verse 19न अहन्ता है, न अन्य है ओर न तो शून्य ही है, क्योकि दोनों का साक्षी विद्यमान है, इस प्रकार…
- Verse 20उपादेय (ग्राह्य) विषयों मे मन का अनुराग ओर हेय (त्याज्य) विषयों मे मन का द्वेष ही पुरुष क…
- Verse 21हे श्रीरामचन्द्रजी, हेय वस्तुओं के प्राप्त होने पर आप खिन्न न होइये ओर उपादेय वस्तुओं मेँ…
- Verse 22जिन लोगों की, यह उपादेय है, यह हेय है, ऐसी अवस्था सर्वत्र अहेय आत्ममात्र के दर्शन से विली…
- Verse 23जब तक चित्त से हेय ओर उपादेय की कल्पना क्षीण नहीं हई, तब तक जैसे मेघाच्छन्न आकाश में चाँद…
- Verse 24यह वस्तु खराब है इसलिए त्याज्य है, यह वस्तु उत्तम है इसलिए ग्राह्य है, इस प्रकार जिसका मन…
- Verse 25यह वस्तु मेरे अनुकूल हे अतः यह मुझे प्राप्त हो, इस प्रकार लाभ से विलासित होनेवाली ओर यह व…
- Verse 26उस पुरुष मे समता और स्वच्छता की संभावना में क्या विरोध है, ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैं। अ…
- Verse 27इच्छित, अनिच्छित की आशंकारूपी चंचल वानरियाँ जिस पुरुष के चित्तरूपी वृक्ष पर स्फुरित होती…
- Verses 28–30अब जीवन्मुक्त पुरुष के लक्षणभूत पन्द्रह गुणों को कहते हैं। निराशता, निर्भयता, नित्यता, सम…
- Verses 31–33इस समय उक्त गुणों के अर्जन में उपाय का उपदेश देते हैं। जैसे बह रहे जल को बाँध से रोकते है…
- Verses 34–36हे सौम्य, चिर अभ्यास से दृढ़ हुए एकात्मस्थिरतारूप चित्त धेर्य से सम्पन्न अतएव अनादिकाल से…
- Verse 37यदि कोई शंका करे कि पहले से सिद्ध मन का उक्त उपाय द्वारा विनाश होने पर भी भावी मनोवृत्ति…
- Verse 38चित्त ओर चेत्य इन दोनों के विस्मरण में उनके ऊपर आस्था का त्याग ही उपाय है, ऐसा कहते हैं ।…
- Verse 39आस्था का त्याग करने पर समता भी सिद्ध होती है, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, समता का प…
- Verse 40जैसे महेश्वर पृथ्वी आदि अष्टमूर्तिरूप लिंगों को शुद्ध चिन्मात्रदृष्टि से नहीं धारण करते औ…
- Verse 41नान्योऽतोऽरित द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता । (इससे अन्य द्रष्टा नहीं है, इससे अन्य श्रोत…
- Verses 42–48यदि मैंने ही इसका विस्तार किया है, तो इसमें मेरे हर्ष-क्रोध से होनेवाले दोष क्यो होते हैं…
- Verse 49इस प्रकार मन असत्कल्प है, यह बात सिद्ध हुई, यह एक अद्वितीय आत्मा का विस्मरण कर, उसकी जगत…
- Verse 50मन की प्रकाशशक्ति के समान स्पन्दनशक्ति भी चित् के अधीन है, ऐसा कहते है । जो जड़ मन शव के…
- Verse 51अतएव चित् में स्पन्दन कल्पना है, वही मन है, ऐसा विद्वानों का प्रतिवाद है यह कहते है । यह…
- Verse 52स्पन्दशक्ति के ही विलास चित्त और चित्तवृत्तियाँ हैं, ऐसा कहते हैं। जो चित्तरूपी साँप का फ…
- Verse 53इससे सिद्ध हुआ कि वित् का चेत्य त्याग ही ब्रह्मतारूप से पर्यवसन्न होना है, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 54काल द्वारा मनन से यह कलना मन होती है, ऐसा कहते हैं। जो सच्चिदानन्दरूप है, वही कलना बन कर…
- Verse 55नित्य अनुभवस्वभाव ब्रह्म का स्वरूपविस्मरण होने पर कलना ही स्मृतिता को और चित्तता को प्राप…
- Verse 56अतीत विषयों के आकार की कल्पना से चित्तता के समान अनागत विषयो के आकार की कल्पना से संकल्प-…
- Verse 57वह चिति ही अपनी मायाशक्ति से जगत्ता को मानों प्राप्त हुई है। जब तक गुरु, शास्त्र और विचार…
- Verse 58इसलिए शास्त्रविचार से, उत्कृष्ट वैराग्य से ओर इन्द्रियों के निग्रह से कलना को कलनारूप जो…
- Verses 59–60शास्त्रजन्यज्ञान से, शम आदि साधनयुक्त मनन ओर निदिध्यासनं से प्रबुद्ध हुई सब लोगों की कलना…
- Verse 61यदि कोई शंका करे कि कलना यदि सोई है, तो जगत को कैसे जानती है अथवा जानने पर प्रसिद्ध चित्स…
- Verse 62विषयांश का त्याग करने पर बची हुई कलना ही आत्मा है, ऐसा कहने पर वृत्तिज्ञान ही आत्मा है, ऐ…
- Verse 63यदि वह सर्वसाक्षिणी है, तो तत् तत् अन्तःकरण धर्मो को ही क्यो प्रकाशित करती है, सबको क्य…
- Verse 64हे श्रीरामचन्द्रजी, पाषाणतुल्य, जड कलना जैसे पद्मिनी धूप से प्रबोधित होती हे वैसे ही परम…
- Verse 65जो नैयायिक आदि नित्य साक्षी को न जानते हुए पर प्रकाश्य अनित्य ज्ञान को ही अर्थप्रकाशक मान…
- Verse 66अचेतन अन्तःकरणवृत्ति आदि मे नित्यचित् की सन्निधि के अभाव में विषयोन्मुख प्रवृत्ति ही नही…
- Verses 67–68खून से लथपथ शरीरवाले मुर्दे कहाँ दौड, वन के पत्थर के टुकड़ों ने कहाँ मधुर गीत गाया ? पुरु…
- Verse 69पत्थर के तुल्य जड, मिथ्या भ्रमो से उत्पन्न मृगतृष्णामय इन मनों से कहाँ क्रिया की जाती हे ?
- Verse 70नित्यचिदात्मा का यदि स्वीकार न किया जाय, तो कलना आदि के अध्यास की सिद्धि ही नहीं होगी, ऐस…
- Verse 71चित् की परिच्छिन्न स्यन्दकल्पना ही मन है, ऐसा पहले कहा गया है, अब चित् ओर अचित् अंश का…
- Verse 72पूर्वोक्त प्राणशक्ति संकल्प से उत्पन्न हुई है, संकल्परहित योगियों की चिदात्मरूप ही वह पृथ…
- Verse 73वही "यह मैं हूँ” "यह मेरा है” इस प्रकार जब विषयों की कल्पना करती है, तब स्पन्द के बिना उस…
- Verse 74इसी प्रकार और भी उसकी संज्ञाएँ परसिद्ध हैं, ऐसा कहते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, असत् संकल्…
- Verse 75क्यों परमार्थतः नहीं हैं ? ऐसा यदि कोड कहे, तो इस पर कहते हैं। चूँकि परमार्थतः न मन है, न…
- Verse 76यदि आत्मा ही है, तो वह क्यो नहीं प्रतीत होता अथवा जगद्रूप से कौन प्रतीत होता है ? ऐसी शंक…
- Verses 77–78कैसे वह नहीं-सा है और कैसे है ही, यह निश्चय हुआ ? इस पर कहते हैं। स्वच्छ होने के कारण चक्…
- Verse 79स्थूलता आदि के अभाव से अन्य इन्द्रियाँ उसमें भले ही प्रवृत्त न हों / पर मन तो सूक्ष्म होन…
- Verses 80–81अपनी उत्पत्ति का विरोधी होने से भी मन की आत्मदर्शन में शक्ति नहीं है, ऐसा कहते हैं। परम प…
- Verse 82इसलिए संकल्प चित्त की उत्पत्ति में बीज है, यह हम बहुत बार कह आए है, ऐसा कहते हैं। संसार क…
- Verse 83यदेतत्स्यन्दितं नाम“ इत्यादि से जो विषय प्रस्तुत किया, उसका प्रयोजन कहते है । हे श्रीरामच…
- Verse 84प्राणरूप ही मन है, यह कैसे ज्ञात हुआ ? इस पर कहते है । जीवित पुरुष मन के दुर देशान्तर के…
- Verse 85इस प्रकार प्राण के निरोध से मनो-निरोध की सिद्धि के लिए दोनों की एकता का प्रतिपादन कर निरो…
- Verse 86अब अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणः“ इस श्रुति के अनुसार भिन्न उपादानवाले प्राण ओर मन भि…
- Verses 87–89तब वे शक्तियाँ किसकी है, यह आशंका होने पर कहते हैं। स्पन्दन प्राणवायु की शक्ति है, वह चलद…
- Verse 90चित्शक्ति और स्पन्दशक्ति की संगति में यह संकल्प-कल्पना निमित्त है, संकल्प-कल्पना यदि न क…
- Verse 91वायु की जो स्पन्दशक्ति है, वह चित् से चेतन बनाई जाती है, चेत्यसहित वह चित् तभी संकल्प स…
- Verses 92–93चित्त की यह चित्तता बाल के यक्ष के समान मिथ्या कल्पित है, क्योकि जिसमें अखण्डमण्डलाकार रू…
- Verse 94इसलिए सम्बन्धी न होने के कारण सम्बन्ध यहाँ नहीं है, सम्बन्ध के बिना मन किसका ओर केसे सिद्…
- Verse 95इस प्रकार चित् और स्पन्द के भेद पक्ष मे मन की अलीकता कह कर अभेद पक्ष में तो वह सुतरां अल…
- Verse 96इसलिए हे श्रीरामचन्द्रजी, दोनों पक्षो में मन का सम्भव न होने से तीनों जगतों में दुष्टात्म…
- Verse 97हे अनघ, अनर्थ के लिए व्यर्थ मन का संकल्प आप मत कीजिये । मन मिथ्या ही उदित हुआ है, परमार्थ…
- Verse 98हे महामते, कहीं पर आप अपने मन में कुछ भी संकल्प न कीजिये, क्योकि संकल्प करनेवाला मन यहाँ…
- Verse 99हे मननशील श्रीरामचन्द्रजी, सम्यक् ज्ञान से आपके हृदयरूपी मरुभूमि में असम्यक् ज्ञान से उ…
- Verses 100–101जड़ होने से ओर स्वरूपहीन होने से मन सदा ही मरा है, मरे हुए मन से लोग मारे जाते हैं, यह चक…
- Verse 102जिसका न स्वरूप है, न शरीर है, न कोई आधार है और न जाति ही है वह इन सबको खा डालता हे, यह बड…
- Verse 103जो पुरुष जड, मूक ओर अन्धे मन से भी मारा गया, वह मूढ चन्द्रमा की किरणों से जलता है, ऐसी मे…
- Verses 104–105विद्यमान और शत्रु को जीतने की सब सामग्री से सम्पन्न होने पर भी मूढ पुरुष अविद्यमान मन से…
- Verse 106महामायावी-रूप से प्रसिद्ध मयासुर का भी निर्माण करनेवाली यह माया अत्यन्त अद्भूत है, जिससे…
- Verses 107–108जब मूर्खता आती है, तब पुरुष सभी आपत्तियों का भाजन होता हे, इसमें तनिक भी विवाद नहीं हे, क…
- Verse 109की जाती हे । भाव यह है कि अन्ध के तुल्य जड़ मन आदि की स्वभाविक मूर्खता से पीड़ित प्रपंच क…
- Verse 110वही जल जहाँ पर भँवरी होती है, वहो पर नीलांजन के तुल्य वर्णवाला, बीच में छेद से युक्त, पीस…
- Verse 111शत्रुओं से केवल देखा गया पुरुषनेत्रो से रची गई रस्सियों से मानों बोधा जाता है और संकल्प -…
- Verses 112–113इसलिए अत्यन्त कोमल होने के कारण यह सृष्टि कहीं पर भी स्थित नहीं हुए, व्यर्थ कल्पित, द्वित…
- Verse 114क्योकि उस पुरुष की बुद्धि चारों ओर से विषयों मे ही आरूढ है, उसीसे ही वह परिपूर्ण-सी स्थित…
- Verses 115–116वीणा की तन्त्री मधुर ध्वनि से भी यह डरती हे । निद्रायुक्तबन्धु की भी मुखकान्ति से डरती है…
- Verse 117अव पूर्वोक्त दुष्प्रज्ञा भले ही उरे, तथापि उसके कारण पुरुष का व्यामोह उचित नहीं है, इस प्…