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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 63

संस्कृत श्लोक

तनुः संकल्पिता यैषा कलनेति जगत्त्रये । सा हि किंचिद्विजानाति नित्यं ज्ञानैकधर्मिणी ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि वह सर्वसाक्षिणी है, तो तत्‌ तत्‌ अन्तःकरण धर्मो को ही क्यो प्रकाशित करती है, सबको क्यो नहीं प्रकाशित करती है 2 तो इस पर कहते हैँ । जो यह नित्यबोधस्वरूप साक्षी चिति है, वह परिच्छिन्न वृत्तिरूप कलना की उपाधि के कारण थोडी ही है, इस तरह तीनों जगतो में उन-उन प्राणियों द्वारा वह संकल्पित हे, इसलिए थोड़ा ही (तत्तत अन्तःकरणधर्मो को ही) नित्य जानती हे