Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 62
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 62 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 62
संस्कृत श्लोक
तया परमया दृष्ट्या कलनैषान्तरस्थया ।
मञ्जरी गन्धशक्त्येव पदार्थेषु विराजते ॥ ६२ ॥
हिन्दी अर्थ
विषयांश का त्याग करने पर बची हुई कलना ही आत्मा है, ऐसा कहने पर वृत्तिज्ञान ही आत्मा है, ऐसा
कोई न समझ जाय, इसलिए उसके साक्षी उसके अन्दर स्थित शुद्ध चित् को पृथक् करके दिखलाते है ।
गन्धशक्ति से मंजरी के समान यह चित्तवृत्तिरूप कलना अन्दर स्थित उस सर्वसाक्षिणी परमदृष्टि
से व्याप्त होकर अपने-अपने विषयों के प्रकाशन में समर्थ होती है स्वतः नहीं होती