Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 102
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 102 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 102
संस्कृत श्लोक
सर्वसामग्र्यहीनेन हन्यते मनसापि यः ।
नीलोत्पलदलाघातैर्मन्ये दलितमस्तकम् ॥ १०२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका न स्वरूप है, न शरीर है, न कोई आधार है
और न जाति ही है वह इन सबको खा डालता हे, यह बड़ा अदभुत मूर्खतारूपी जाल है ॥ १० १॥ जो पुरुष
सब प्रकार की सामग्रियों से रहित मन से भी मारा जाता है, उसें मेँ जिसका सिर नीलकमल की पँखुड़ियों
से चूर-चूर किया गया, ऐसा समझता हूँ