Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 104–105
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verses 104–105 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 104,105
संस्कृत श्लोक
विद्यमानोऽपि यः शूरो लोकस्तेनाभिभूयते ।
अविद्यमानमेवेदं हन्यते मुग्धतोदिता ॥ १०४ ॥
मिथ्यासंकल्पकलितं मिथ्यावस्थितिमागतम् ।
अन्विष्टमपि नो दृष्टं का तस्य किल शक्तता ॥ १०५ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्यमान और शत्रु को जीतने की
सब सामग्री से सम्पन्न होने पर भी मूढ पुरुष अविद्यमान मन से अभिभूत होता है ओर विवेकी पुरुषों द्वारा
वैराग्य आदि महाप्रयास- साध्य साधनों से ओर योग, ध्यान, समाधि-अभ्यास, साक्षात्कार के उपायों
से अविद्यमान ही मन का नाश किया जाता है, यह सब कल्पना मिथ्या ही उदित हुई है, वास्तविक नहीं
हे । मिथ्या संकल्प से कल्पित, मिथ्या ही स्थिति को प्राप्त हुआ, खोजने पर भी जो दुष्टिगोचर नहीं हुआ,
उसकी लोगों के ऊपर आक्रमण करने की क्या शक्ति है २