Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 77–78
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verses 77–78 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 77
संस्कृत श्लोक
अच्छत्वादसदाभासः संविद्रूपतया तु सत् ।
आत्मा सर्वपदातीतः स्वानुभूत्यानुभूयते ॥ ७७ ॥
मनस्तत्र परिक्षीणं यत्र संवित्परात्मनः ।
अन्धकारक्षयस्तत्र यत्रालोकः प्रवर्तते ॥ ७८ ॥
हिन्दी अर्थ
कैसे वह नहीं-सा है और कैसे है ही, यह निश्चय हुआ ? इस पर कहते हैं।
स्वच्छ होने के कारण चक्षु आदि की योग्यता में प्रयोजक स्थूलता, नीलता आदि के अभाव से वह
असत्-सा प्रतीत होता है और चिद्रूप होने से स्वपरप्रकाशक होने के कारण वह सत् है, अतएव
सर्वपदातीत आत्मा केवल अपने अनुभव से ही प्रतीत होता है न कि इन्द्रियों से