Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 42–48
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verses 42–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 42-48
संस्कृत श्लोक
येनात्मदृश्यसद्भावादभितो भावनोज्झिता ।
स न संगृह्यते दोषैर्हर्षामर्षविषादजैः ॥ ४२ ॥
रागद्वेषविनिर्मुक्तः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
युक्त इत्युच्यते योगी त्यक्तसंसारवासनः ॥ ४३ ॥
स यत्करोति यद्भुङ्क्ते यद्ददाति निहन्ति यत् ।
तत्र मुक्तधियस्तस्य समता सुखदुःखयोः ॥ ४४ ॥
प्राप्तं कर्तव्यमेवेति त्यक्तेष्टानिष्टभावनः ।
प्रवर्तते यः कार्येषु न स मज्जति कुत्रचित् ॥ ४५ ॥
चित्सत्तामात्रमेवेदमिति निश्चयवन्मनः ।
त्यक्तभोगाभिमननं शममेति महामते ॥ ४६ ॥
मनः प्रकृत्यैव जडं चित्तत्त्वमनुधावति ।
मांसगर्धेन मार्जारो वने मृगपतिं यथा ॥ ४७ ॥
सिंहवीर्यवशाल्लब्धं मांसं भुङ्क्तेऽनुगो हरेः ।
चिद्वीर्यवशतः प्राप्तं दृश्यमाश्रयते मनः ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि मैंने ही इसका विस्तार किया है, तो इसमें मेरे हर्ष-क्रोध से होनेवाले दोष क्यो होते हैं ? इस
पर कहते हैं।
जिस तत्त्वज्ञानी ने सद्रूप आत्मदृश्य की परमार्थसन्मात्र भावना से चारों ओर अन्य कोई वस्तु है,
ऐसी भावना का त्याग कर दिया, वह पुरुष हर्ष, क्रोध, विषाद आदिसे होनेवाले दोषों से आक्रान्त नहीं
होता, इसलिए आप भी द्वैत की भावना का त्याग कीजिये । जो राग और द्वेष का त्याग कर चुका है,
जिसके लिए ढेला, पत्थर और सोना समान है एवं जिसने संसार की वासनाओं का त्याग कर दिया है,
ऐसा योगी युक्त कहा जाता है । वह जो कुछ करता है, जो भोजन करता है, जो देता है और जो मारता
है, इन सबमें उस मुक्तबुद्धिवाले पुरुष की सुख-दुःख के विषय में समानता रहती है जो इष्ट और
अनिष्ट भावना का त्याग कर यह प्राप्त कर्म कर्तव्य ही है, इस बुद्धि से कार्यों में प्रवृत्त होता है, वह कहीं
पर भी निमग्न नहीं होता है। हे महामते, यह मैं और जगत चित्तसत्तामात्र ही है, इस प्रकार के निश्चयवाला
मन, जिसने भोगचिन्ता का त्याग कर दिया है, शान्ति को प्राप्त होता है।
यह मैं और जगत चित्सत्तामात्र ही है, ऐसा जो ऊपर कहा है, उसका उपपादन करते हैं।
चूँकि मन स्वभावतः जड़ है, अतः स्वतः सिद्ध होने और दूसरे का (अपने विषय का) साधन करने
के लिए स्वयं असमर्थ होने के कारण अपनी सिद्धि और अपने विषय के साधन के लिए स्वसाक्षिभूत,
स्वप्रकाश, चिद्रूप पारमार्थिक वस्तु का अनुसरण करता है । जैसे कि अपने जीवननिर्वाह के लिए और
अपने बच्चों के भरण-पोषण के लिए मांस की अभिलाषा से बिलाव वन में सिंह का अनुसरण करता है ।
जैसे सिंह का अनुगामी बिलाव सिंह के पराक्रम से प्राप्त मांस खाता है वैसे ही मन चित् के बल से प्राप्त
दृश्य का (स्व ओर स्वविषय का) आश्रय लेता है