Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 86
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 86 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 86
संस्कृत श्लोक
दृषदो विद्यते शक्तिः कदाचिच्चलनैधसाम् ।
न पुनर्मनसामस्ति शक्तिः स्पन्दावबोधने ॥ ८६ ॥
हिन्दी अर्थ
अब अन्नमयं हि सोम्य मन आपोमयः प्राणः“ इस श्रुति के अनुसार भिन्न उपादानवाले प्राण ओर
मन भिन्न है, इस पक्ष में भी मन में स्वतःस्यन्दशक्ति ओर चित्शक्ति का अभाव होने से वे दोनों प्राण
ओर चिदात्मा के अधीन ही हैं, इसलिए प्राण का निरोध होने पर मन के निरोध की उपपत्ति हो गई। इस
आशय से कहते हैं।
शिला में भी कदाचित् चलनशक्ति और ज्वलनशक्ति हो सकती है, किन्तु मन की स्पन्द में और
वेदन में शक्ति नहीं है