Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 109
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 109 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 109
संस्कृत श्लोक
मन्ये मौर्ख्यमयी सृष्टिरियमत्यन्तपेलवा ।
वास्तरङ्गप्रवाहेण कणशः परिशीर्यते ॥ १०९ ॥
हिन्दी अर्थ
की जाती हे । भाव यह है कि अन्ध के तुल्य जड़ मन आदि की स्वभाविक मूर्खता से पीड़ित प्रपंच का पुनः
उसके दुःख को जाननेवाले जीव से पीडन अत्यंत अनुचित है ॥ १० ८॥ यह मूर्खतामयी सृष्टि अविचारमात्र
से सिद्ध हे, अतएव एकमात्र विचार से इसका बाध किया जा सकता हे, जैसे जल अपने द्वारा कल्पित तरंग
के प्रवाह से छोटी-छोटी वृदां में विभक्त होता है, यह भ्रान्ति विचार -मात्र से नष्ट होती है । वैसे ही यह
सृष्टि की भ्रान्ति भी विचारमात्र से नष्ट होती हे