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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 13–15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verses 13–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

संसारमननं चित्रं विचारेण विलीयते । गलद्वशीकृतस्पर्शमातपेन हिमं यथा ॥ १३ ॥ अयमेवाहमित्यस्या निशाया उदिते क्षये । स्वयं सर्वगतः स्फारः स्वालोकः संप्रवर्तते ॥ १४ ॥ अयमेवाहमित्यस्मिन्संकोचे विलयं गते । अनन्तभुवनव्यापी विस्तार उपजायते ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे धूप से जिसकी शीतलता हर ली गयी, ऐसा हिमकण गलकर लीन हो जाता है, वैसे ही यह विचित्र संसार चिन्तन विचार से विलीन हो जाता है