Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तावत्तावद्विजित्यारीनिन्द्रियाख्यान्पुनःपुनः ।
यावदात्मात्मनैवायमात्मन्येव प्रसीदति ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
वे प्राप्तव्य वस्तु को कैसे प्राप्त करते हैं, ऐसी शंका होने पर उसे कहते है ।
सत्त्वगुण की अभिवृद्धि से जब आत्मा अपने से ही अपने में प्रसन्न होता हे, तब रजोगुण की
विष्टम्भशक्ति (आवरणशक्ति) से इन्द्रियनामक शत्रुओं को पुनः-पुनः जीतकर वे स्वयं प्राप्तव्य वस्तु
को प्राप्त करते हैं