Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 79
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 79 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 79
संस्कृत श्लोक
यत्रात्मसंविदोऽच्छायाः संकल्पोत्थतया मताः ।
तत्रात्मनो विस्मरणं स्मरणं चित्तजन्मनः ॥ ७९ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूलता आदि के अभाव से अन्य इन्द्रियाँ उसमें भले ही प्रवृत्त न हों / पर मन तो सूक्ष्म होने के
कारण अर्थनिर्णय हेतु रूप से प्रसिद्ध है, वह उसमें क्यो न प्रवृत्त होगा ? इस पर कहते हैं।
जहाँ पर परमात्मसंवित् है, वहाँ पर मन क्षीण हो जाता है । जहाँ पर प्रकाश रहता है, वहाँ पर
अन्धकार क्षीण हो जाता है। भाव यह कि ठीक है मन उसमें प्रवृत्त होता, यदि उसके दर्शन के समय में
ही वह स्वयं नष्ट न हो जाता। मन अज्ञान का कार्य है, अतः आत्मसाक्षात्कार की वृत्ति का उदय होते ही
अविद्या के साथ वह तुरन्त नष्ट हो जाता है, अतः मन में आत्मदर्शन योग्यता नहीं है ॥७ ८॥
तब कहाँ पर मन की वृत्तिशक्ति है ? इस पर कहते हैं।
जिस अवस्था में अत्यन्त स्वच्छ आत्मरूप संवित् के बाह्य अर्थ संकल्पवश बाह्यविषयाकाररूप से
उत्पन्न होने के कारण प्रकाश्यरूप से अभिमत होते हैं, वहाँ पर पारमार्थिक आत्मा का विस्मरण और
चित्त से उत्पन्न हुआ मिथ्या पदार्थो का दर्शन प्रसिद्ध है