Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 94
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 94 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
अतः संबन्धिनोऽभावात्संबन्धोऽत्र न विद्यते ।
संबन्धेन विना कस्य सिद्धं तत्कीदृशं मनः ॥ ९४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए सम्बन्धी न होने के
कारण सम्बन्ध यहाँ नहीं है, सम्बन्ध के बिना मन किसका ओर केसे सिद्ध हो ? भाव यह कि अचित् का
चित् के साथ विरोध है, विरोध होने पर चित्सत्ता से बाधित स्थितिवाला होने से मन क्या पदार्थ होगा ?
यदि जड़ मन भी अपनी सत्ता में अन्यनिरपेक्ष, स्वतः सिद्ध कहा जाय, तो उसका अनुभव करनेवाले
उसके सम्बन्धी अन्य चेतन का अभाव होने से चित्सम्बन्ध के बिना वह मन किसका ओर कैसे सिद्ध
होगा ? अनुभव में आरूढ न होने पर अलीक (झूठा)-पुष्प और मन का क्या अन्तर होगा ?