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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verses 112–113

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verses 112–113 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 112,113

संस्कृत श्लोक

तस्मात्किलेयं मनसा न स्थितेनैव कुत्रचित् । कल्पितेन मुधान्येन कृपणेन निहन्यते ॥ ११२ ॥ मूर्खलोकमयी सृष्टिर्मन एवासदुत्थितम् । यः शक्तो न वशीकर्तुं नासौ रामोपदिश्यते ॥ ११३ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए अत्यन्त कोमल होने के कारण यह सृष्टि कहीं पर भी स्थित नहीं हुए, व्यर्थ कल्पित, द्वितीय कृपण मन से नष्ट होती हे । यह मूर्खलोकमयी सृष्टि असत्‌ उदित हुए मन के सिवाय कुछ भी नहीं हे । जो पुरुष उसको वश में करने के लिए समर्थ नहीं है, ह श्रीरामचन्द्रजी, वह आध्यात्मिक शास्त्र के उपदेश के योग्य नहीं हे