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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 84

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 84 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 84

संस्कृत श्लोक

देशान्तरानुभवनं प्राणो वेत्ति हृदि स्थितम् । स्पन्दवेदनतो यत्तन्मन इत्यभिधीयते ॥ ८४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राणरूप ही मन है, यह कैसे ज्ञात हुआ ? इस पर कहते है । जीवित पुरुष मन के दुर देशान्तर के अनुभव को हृदय मेँ स्थित जानता है यानी उस दूर देश के अनुभव मेरे हृदय में है, ऐसा अनुभव करता हे । मन के साथ दूर देश का सम्बन्ध स्पंद के बिना नहीं हो सकता ओर वेदनांश चित्सम्बन्ध के बिना नहीं हो सकता; अतएव स्पंदन ओर वेदन दो शक्तियों के योग से प्राण ही मन कहा जाता है