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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, Verse 75

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 13, verse 75 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 13 · श्लोक 75

संस्कृत श्लोक

मनो नो न मतिर्नापि धीरेषा न शरीरकम् । अस्तीह परमार्थेन स्वात्मैवेहास्ति सर्वदा ॥ ७५ ॥

हिन्दी अर्थ

क्यों परमार्थतः नहीं हैं ? ऐसा यदि कोड कहे, तो इस पर कहते हैं। चूँकि परमार्थतः न मन है, न यह बुद्धि है और न शरीर है यानी इनसे उपलक्षित दृश्यमात्र नहीं है, केवल एकमात्र आत्मा ही सदा विद्यमान है, क्योकि दृश्य “अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रः" “अकायमब्रण- मस्नाविरम्‌' “अस्थूलमनषु” इत्यादि सैकड़ों श्रुतियों, विद्वानों के अनुभवों और युक्‍्तियों से बाधित है