Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 30

उनतीसवाँ सर्ग समाप्त तीसवोँ सर्म चिति की सर्वात्मता सर्वभोक्त॒भाव से स्थिति ओर वह जिस प्रकार से जीवदशा को प्राप्त हुई - इन सबका वर्णन ।

90 verse-groups

  1. Verse 1“चेतनाकाशमात्रात्म यथा सर्वमिदं प्रभो“ यह जो तुमने पूछा था, उसका यह उत्तर दिया, यों कहते…
  2. Verse 2सृष्टि के आरोप का अधिष्ठान है और उसी में यह सब व्यवस्थित है
  3. Verse 3स्वाभाविक, आदि-अन्त से रहित, अद्वितीय, अखण्ड तथा बहुवित्तव्यय, आयास आदि बाहरी, साधनों से…
  4. Verse 4हे मुनिश्रेष्ठ, चूकि तुम विवेकी यानी मुख्य अधिकारी हो, इसलिए मैं तुमसे कहता हू कि सबसे बड…
  5. Verses 5–6मूर्ति आदिरूप साकार देव की अर्चना में कौन अधिकारी हैं ? इस प्रश्न पर उसके (मूर्तिरूपः देव…
  6. Verse 7उक्त कृत्रिम प्रतिमा-प्रचुर देवार्चन उत्तम चावल न मिलने पर कोदो खाने के समान है, ऐसा कहते…
  7. Verse 8अपने संकल्पो से रचित पदार्थो से देवार्चन सम्पादन कर जिन कीन्हीं स्वप्न सदृश मिथ्याभूत विम…
  8. Verse 9हे ब्रह्मन्‌, बालबुद्धि पुरुषों के लिए ही पुष्प, धूप आदि द्वारा अर्चन की कल्पना की गई है…
  9. Verse 10हे बुद्धिमान में श्रेष्ठ महर्ष, हम लोगों द्वारा कल्पित प्रपंच के भीतर चक्षु आदि से दिखाई…
  10. Verse 11समस्त ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि देवताओं से तथा समस्त मनोवृत्तियों से परे एवं समस्त पदों…
  11. Verse 12आत्मदेव तो पूजा ओर फल दोनो अवस्थाओं में नित्य, निरतिशय, परमार्थसत्य पूणनिन्द स्वभाव ही है…
  12. Verse 13समस्त कल्पनाओं से वर्जित, सकल भावपदार्थो के भीतर रहनेवाली, निखिल पदार्थो में सत्तास्फूर्त…
  13. Verse 14हे ब्रह्मन्‌, सत्‌ ओर असत्‌ के (भाव-अभाव, वर्तमान और उससे अन्य काल, मूर्त-अमूर्त, कार्यका…
  14. Verse 15त्रिकाल अबाधित सर्वानुगत सत्त्व-स्वभाव से उसने सर्वत्र समरूपता प्राप्त की है, वह महाचैतन्…
  15. Verse 16लताओं के अन्दर स्थित रस की नाई वह सर्वात्मरूप देव व्यवहारकाल मेँ सर्वत्र अनुगत होने के का…
  16. Verses 17–18सभी देवता आदि की मुख्य आत्मा होने से वही मुख्य देव है, यों कहते हैं। हे पापशून्य मुने, अर…
  17. Verse 19विचार करने पर सम्पूर्ण देवताओं का सारभूत होने से वही देव है, यों कहते है । ब्रह्मन्‌, हाथ…
  18. Verse 20एकमात्र चिदात्मा ही इस दृश्य संसार का सार है, इसलिये सकल सारभूत वस्तुओं की भी साररूपता को…
  19. Verse 21हे ब्रह्मन्‌, वह न तो दूर ही स्थित है ओर न किसी के लिए दुष्प्राप्य ही है । वह सदा इसी शरी…
  20. Verses 22–23वही सबका कर्ता ओर भोक्ता है, यो कहते है। वही आत्मदेव क्रिया करता हे, वही खाता है, वही पाल…
  21. Verse 24हे मुनीश्वर, वही इन चित्र-विचित्र चेष्टाओं से युक्त, उसीके कारण चेतनावाली तथा उसीके स्वरू…
  22. Verse 25जो मन को लेकर छः इन्द्रियों की प्रवृत्ति-सत्ता से रहित तथा निर्मल रूपवान है, उस आत्मदेव क…
  23. Verse 26वही यह परमात्मा चिद्रूप, सूक्ष्म, सर्वव्यापी ओर मायारहित हे । वही भास्य के आरोप-काल में इ…
  24. Verse 27हे प्राज्ञ, वह चिति अत्यन्त निर्मल है और वह इन जागतिक क्रियाओं को जगत के लिए उस प्रकार शो…
  25. Verses 28–31चैतन्य के जो सुन्दर चमत्कार (आरोप्य में सत्तास्फूर्तिप्रदान रूप) है, वे चैतन्य में मायाशब…
  26. Verse 32तव क्या चैतन्य अपने भोग की इच्छा से जगत-सृष्टि करता है, इस प्रश्न पर नहीं” ऐसा उत्तर देते…
  27. Verse 33इन संपूर्ण त्रैलोक्यरूपी समुद्रों के तात्त्विक स्वरूपोंका विचार करने पर अकेली चिति ही सदा…
  28. Verse 34भोक्ता के अविवेक से उसमें मानसिक संकल्प से जनित भोक्ता आदि त्रिपुटी का प्रकाशकत्व ही भोक्…
  29. Verse 35इसी तरह उसमें कर्तृत्व भी अपने में आरोपित कारकों के परिभ्रमणप्रकाश के निमित्तरूप ही है; इ…
  30. Verse 36बन्धन में डालनेवाले चित्तविकारात्मक (कर्तृत्व-भोक्तृत्वात्मक) आचार से सुन्दर एवं चपल व्यष…
  31. Verses 37–38(८) इस विषय में भगवान श्री गौडपादाचार्यजी ने कहा है : भोगार्थ सुष्टिरित्येके क्रीडार्थमित…
  32. Verse 39हे ब्रह्मन्‌, चिति ने ही वृषभ और चन्द्रमा के चिन्हों से युक्त त्रिनेत्ररूप धारणकर गौरीरूप…
  33. Verse 40हे ब्रह्मन्‌, जिस प्रकार वृक्ष के अनेक पत्ते होते हैं अथवा जिस प्रकार सुवर्णं मेँ चित्र-व…
  34. Verse 41समस्त देवताओं की सेना से चारों ओर वन्दिति-चरणवाली इन्द्रलीला के द्वारा चिति ही त्रैलोक्य…
  35. Verse 42त्रिलोकी के अन्दर आकाश में सूर्य आदि तेजोरूपता प्राप्तकर यह चैतन्य अपने स्वरूप में ही उस…
  36. Verse 43साक्षात्‌ भी चिति आनन्दप्रकाश में कारण है, यह कहते हैं। चारों दिशाओं में प्रकाश का विस्ता…
  37. Verse 44चितिरूपी दर्पण की महालक्ष्मी (स्वच्छ प्रकाशस्वरूप शोभा या वैष्णवी माया) अनुग्रहपूर्वक अपन…
  38. Verse 45ब्रह्मन्‌, जिस प्रकार रसशक्ति जलसमूहरूप होकर समुद्र की स्वरूपसत्ता का सम्पादन करती है, उस…
  39. Verse 46अव उसी विति का लतारूप से वर्णन करते हैं। मायाकाशरूपी क्यारी में उत्पन्न हिरण्यगर्भ रूप से…
  40. Verses 47–51चिद्रूपी यह लता अनेकविध जीवों के समूहरूप धूलि-पुंज मेँ वासनारूपी जल से सिचित है, उसके चार…
  41. Verse 52इसी महाचैतन्य से सूर्य आदि सदा प्रकाशित होते हैं और उसी चिति के स्वरूपभूत सत्य, प्रकाश तथ…
  42. Verse 53झंझावात के आवर्त में रहनेवाली, एकमात्र चिति से ही सिद्ध हुई और उसी की सत्ता के कारण दर्शन…
  43. Verse 54त्रैलोक्य के प्रकाशन के लिए दीपक की शिखारूप यह चिति ही इस समस्त जगत के कार्यों को उस तरह…
  44. Verse 55जगत का प्रकाश एकमात्र चिति के ही द्वारा होता है, इसका उपपादन करते हैं। निर्मल चितिरूपी चन…
  45. Verse 56चितिरूपी अमृत के सिंचन से यह पदार्थ-समूहों की पंक्ति ही उस प्रकार रूप और फल धारण करती है,…
  46. Verse 57शंका हो कि यदि विति ही अमृत की नाई पदार्थ-समूहों के चारों ओर व्याप्त होकर स्फुरित होती है…
  47. Verse 58इस परिस्थिति में जैसे सूर्य आदि के प्रकाश से ही घर, महल आदि चित्रविचित्र आकृतियों की सिद्…
  48. Verse 59जिसमें चैतन्याकाश का प्रकाश विद्यमान है, ऐसे इस देहरूपी घर में संकल्प रूपी लड़कों को धारण…
  49. Verse 60कथित अर्थ का अनुभव कराने के लिए व्यतिरेकी दृष्टान्त से प्रसिद्ध उदाहरणों में समर्थन करते…
  50. Verse 61हे भद्र, सुनो ! यद्यपि इस देहरूपी वृक्ष में हाथ, पैर आदि अपने अंग ही शाखाएँ हैं और केशों…
  51. Verse 62ऐसी स्थिति में जैसे जल के अधीन तरंग आदि समस्त भावपदार्थ परमार्थतः जलस्वरूप ही होते हैं, व…
  52. Verse 63महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, चन्द्रमा की किरणों के सदृश निर्मलवाणी से त्रिनेत्र…
  53. Verse 64महाराज, यदि अकेली चिति ही सर्वत्र व्याप्त है तो तत्स्वरूप यह देह निद्रा, मुर्च्छा, मरण आद…
  54. Verse 65उसीका पुनः स्पष्टीकरण करते हैँ । ये देह आदि दुश्यभाव से पहले और जीवनदशा में चेतन होकर तदन…
  55. Verse 66“यथा तच्चेतनस्यैव जीवादित्वं तदुच्यताम्‌“ इस पूर्व प्रश्न का उत्तर बिना सुने ही वसिष्ठजी…
  56. Verse 67कहे जानेवाले उपोद्घात से पहले शरीर में विम्ब ओर प्रतिबिम्ब के भेद से दो प्रकार का चैतन्य…
  57. Verse 68जिस प्रकार चिति का चलस्वभाव उपाधि-प्रयुक्त है, उसी प्रकार उसका भेद भी उपाधि प्रयुक्त ही ह…
  58. Verse 69जिस प्रकार इस संसार में वही (सुशील ही) पुरुष क्रोधवशं क्षणभर में राक्षस-सा क्रूर हो जाता…
  59. Verse 70हे ब्रह्मन्‌, उपर्युक्त रीति से विरुद्ध कल्पनाओं से भावित अपने स्वरूप से च्युत हुई चिति क…
  60. Verse 71स्वयं चिति ही आकाशसहित सूक्ष्म भूतों की स्वरूपता; शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्धात्मक भोग्…
  61. Verse 72उस प्रकार की चिति में पंचीकरण प्रयुक्त स्थूलभूतात्मक समष्टि-व्यष्टि-स्थूल-देहरूपता, उसके…
  62. Verse 73मनरूपता को प्राप्त हुई चिति उस प्रकार संसार का अवलम्बन कर लेती है, जिस प्रकार “मे चण्डाल…
  63. Verse 74ब्रह्मचिति ही अज्ञानयुक्त स्वरूप की प्राप्ति कर देह ओर जीव के आकार से संकल्पित होकर अज्ञा…
  64. Verse 75अनन्त संकल्पो से ओतप्रोत तथा जडता के संकल्प से स्थूल हुई यह चिति ही जडता से जीवनरूपता का…
  65. Verse 76हे मुने, तदनन्तर वही चित्त, मन, मोह, माया इन संज्ञाओं का निर्माणकर निपुणता से जडता का आश्…
  66. Verses 77–83तदनन्तर मोहरूपी मन्दता को प्राप्त हुई, तृष्णारूपी हथकडी पड़ने के कारण पीडित हुई, काम, क्र…
  67. Verse 84जिस प्रकार ऊँटनी कोटि ओर नीम के पत्ते खाते समय अपनी वासना से भावित स्वल्प मधुर रस की अभिल…
  68. Verse 85अनन्तर एक संकट से दूसरे संकट को प्राप्त हुई, एक दुःख से दूसरे दुःख में गिरी हुई एक विपत्त…
  69. Verse 86अनेक अनर्थ-समूहों से युक्त चेष्टाओं से परवश हृदयवाली वह चिति नरक आदि भूमिय में एक कष्ट से…
  70. Verse 87तदनन्तर क्रमशः मनुष्य शरीर का लाभ होने पर भी बाल्यकाल से लेकर व्यवहार निपुणता के अभ्यास स…
  71. Verse 88उस क्रम से अन्तिम अवस्था प्राप्तकर प्राण-विनाशदशा को प्राप्त हुई यह चिति चारो ओर भयभीत हो…
  72. Verse 89संक्षेप से उक्त अर्थ का विस्तार करते है । बाल्यकाल में चिति के समस्त विषय पराधीन रहते हैं…
  73. Verse 90कर्मगति का विस्तार करते है । कर्मगतिवश कभी स्वर्ग-नगर में उत्पन्न होती है, कभी पाताल कुहर…
  74. Verse 91राक्षसो के आश्रयस्थान में राक्षसी बन जाती है, अरण्य के कोटर में वानरी बन जाती है, पर्वतरा…
  75. Verse 92कभी अपनी कर्मगति से सुमेरु पर्वत पर विद्याधरी बन जाती है, अरण्य बिलों में सर्पिणी बन जाती…
  76. Verse 93चिति ही नारायण होकर समुद्र में नींद लेती है, ब्रह्मा होकर ब्रह्मपुर में ध्यान करती है, हि…
  77. Verse 94भद्र, संवित्‌ ही सूर्य (४) “पदमेव हि तन्नित्यमनित्याः पदिनः स्मृताः“ (ब्रह्मपद ही नित्य ह…
  78. Verse 95संवित्‌ ही ऋतुघटित संवत्सर का चक्र घुमाती है, सहसा युग, मन्वन्तर आदि काल का निर्माण करती…
  79. Verse 96चिति ही कहीं यानी वृक्ष आदि में बीजरूप तथा उसकी अंकुरता में हेतु रसात्मक उल्लास से परिपूर…
  80. Verse 97कहीं पर फलपंक्तियों के पाकों से उपलक्षित रहती है, कीं काठ, अनल आदि से उपलक्षित रहती है, क…
  81. Verse 98चिति ही कहीं उज्ज्वलित आकारवाली, कहीं कुश-कण्टक आदि से दुर्गम, कहीं शिलारूप, कहीं नीलरूप,…
  82. Verse 99सबकी आत्मा, सर्वत्र एवं माया के योग से सर्वस्वरूप होने के कारण चिति उस तरह जगत-रूप ही हो…
  83. Verse 100चिति जब-जब जहाँ पर जिस भाव से जिस तरह अपनी आत्मा का विवर्त द्वारा उपचय करती है, तब-तब वही…
  84. Verses 101–103उन्हीं भावो का फिर विस्तारपूर्वक निरूपण करते है । यह चिति हंसी, क्रौची, बगुली,काकी, सारसी…
  85. Verse 104अपने शब्द से गदही की तरह यह चिति अपने ही संकल्प से डरती है इसके सदृश दूसरी कोई भी मुग्धा,…
  86. Verse 105हे महामुने, यह तुमसे उस जीवशक्ति का निरूपण किया, जो वेचारी प्राकृत आचारो से पराधीन एवं पश…
  87. Verse 106मुनिवर, असीम दुःखपूर्ण विभ्रमों का स्वयं आश्रय करनेवाली "कर्मात्मा" (कमनुसारस्वभावा) इस न…
  88. Verse 107स्वभिन्न सत्ता-स्फूर्ति से रहित, अविद्या से अनियत, विनाशी ओर स्वाभाविक मलरूप असत्‌ के ऊपर…
  89. Verse 108असीम विभवा से भ्रष्ट हुई तथा दुभग्यरूप परिताप से परितप्त हुई यह चिति जीवरूपता प्राप्त कर…
  90. Verse 109भद्र, जडगति अविद्या की सामर्थ्य तो देखो ! जिससे कि पूर्णब्रह्मस्वभाव होती हुई भी शरीरावच्…