Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
सा चिदत्यन्तविमला जगदर्थं जगत्क्रियाम् ।
इमां रञ्जयति प्राज्ञ रसेनेव मधुर्लताम् ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्राज्ञ, वह चिति अत्यन्त
निर्मल है और वह इन जागतिक क्रियाओं को जगत के लिए उस प्रकार शोभित करती हे, जिस प्रकार
वसन्त ऋतु रस से लता को शोभित करती हे