Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 67
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 67 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 67
संस्कृत श्लोक
चिदस्ति हि शरीरेह सर्वभूतमयात्मिका ।
चलोन्मुखात्मिकैका तु निर्विकल्पा परा स्मृता ॥ ६७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहे जानेवाले उपोद्घात से पहले शरीर में विम्ब ओर प्रतिबिम्ब के भेद से दो प्रकार का चैतन्य
बतलाते हैं।
हे ब्रह्मन्, वस्तुतः इस शरीर में दो प्रकार की सर्वभूतमयात्मिका चिति है, एक तो व्यष्टि-समष्टि-
बुद्धि मेँ आसक्त स्वभाव रखनेवाली (विज्ञानमय शब्द से कही जानेवाली कर्ताभोक्तास्वभाव से युक्त)
है ओर दूसरी अशेष विकल्पों से शून्य कूटस्थ