Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 70
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 70 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 70
संस्कृत श्लोक
विकल्पकल्पिता ब्रह्मंश्चित्स्वरूपपरिच्युता ।
जाड्यं क्रमाद्भावयन्ती प्रयाति कलनापदम् ॥ ७० ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, उपर्युक्त रीति से विरुद्ध कल्पनाओं से
भावित अपने स्वरूप से च्युत हुई चिति क्रमशः जडतादात्म्य की भावनाकर अपनी ही कल्पना से
सविकल्प बुद्धि की विषय हो जाती है