Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 64
संस्कृत श्लोक
यदि सर्वगता देव चिदस्त्येका तदात्मकः ।
तदयं चावनिस्फारमयान्धेव न चेतति ॥ ६४ ॥
हिन्दी अर्थ
महाराज, यदि अकेली चिति ही सर्वत्र व्याप्त है तो तत्स्वरूप यह देह निद्रा, मुर्च्छा,
मरण आदि अवस्थाओं एवं अन्यान्य दृश्यों में मृत्तिकाप्रचुर भूतविकाररूप चक्षु आदि इन्द्रियों से
शून्य दीवार की नाई चमकती नहीं है, यह क्यों ?