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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 40

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 40 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 40

संस्कृत श्लोक

चितो ब्रह्मन्विचित्राणि शरीराणीह भूरिशः । पत्राणीव तरोर्हेम्नि केयूरादिक्रियेव च ॥ ४० ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, जिस प्रकार वृक्ष के अनेक पत्ते होते हैं अथवा जिस प्रकार सुवर्णं मेँ चित्र-विचित्र केयूर आदि का निर्माण होता है, उसी प्रकार चिति के चित्र-विचित्र अनेक प्रकार के शरीर यहाँ दिखलाई पडते हैं