Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
ससुरासुरगन्धर्वं सशैलार्णवकं जगत् ।
चिति स्थितं प्रवहति जलावर्ते जलं यथा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी तरह उसमें कर्तृत्व भी अपने में आरोपित कारकों के परिभ्रमणप्रकाश के निमित्तरूप ही है;
इस आशय से कहते हैं।
देव, दानव और गन्धर्वो से युक्त तथा पर्वत, समुद्र आदि से समन्वित यह सम्पूर्ण जगत चैतन्य में
स्थित होकर उस प्रकार घूमता रहता है, जिस प्रकार जल-भँवरी में जल