Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 92
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 92 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 92
संस्कृत श्लोक
विद्याधरी देवगिरौ व्याली च वनगर्तके ।
लता तरौ खगी नीडे वीरुत्सानौ वने मृगी ॥ ९२ ॥
हिन्दी अर्थ
कभी
अपनी कर्मगति से सुमेरु पर्वत पर विद्याधरी बन जाती है, अरण्य बिलों में सर्पिणी बन जाती है, वृक्ष पर
लता बन जाती है, घोंसले में चिड़िया बन जाती है, शिखर पर गुल्मिनी बन जाती है तो कभी वन में
हिरनी बन जाती है