Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
चित्सुभास्वरतामेत्य त्रैलोक्योदरडम्बरे ।
पतत्युदेति संयाति स्वात्मन्येवाब्धिवारिवत् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिलोकी के अन्दर आकाश में सूर्य
आदि तेजोरूपता प्राप्तकर यह चैतन्य अपने स्वरूप में ही उस प्रकार उदित, चलित ओर विलीन होता
है, जिस प्रकार समुद्र में जल