Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अस्मदादिस्त्वसौ कश्चिद्देवो मतिमतां वर ।
देवस्त्रिभुवनाधारः परमात्मैव नेतरत् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
हे बुद्धिमान में श्रेष्ठ महर्ष, हम लोगों द्वारा कल्पित प्रपंच के भीतर चक्षु
आदि से दिखाई पड़नेवाला मूर्ति आदिरूप देव अनिर्वचनीय मायामय ही है ओर समस्त त्रिभुवन का
आधारभूत एकमात्र परमात्मा ही पारमार्थिक देव हे, दूसरा नहीं