Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 55
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 55 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
चिच्चन्द्रबिम्बे विमले शशवत्प्राप्य संगमम् ।
सर्वत्र लक्ष्यतामेति पदार्थश्रीर्जगद्गता ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत का प्रकाश एकमात्र चिति के ही द्वारा होता है, इसका उपपादन करते हैं।
निर्मल चितिरूपी चन्द्रबिम्ब में खरगोश की नाई सम्बन्ध प्राप्त कर यह जगत में अवस्थित
पदार्थ-शोभा सर्वत्र दिखाई पड़ती है