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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 68

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 68 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 68

संस्कृत श्लोक

संकल्पबुद्धा सैवान्तः स्वयमन्येव संस्थिता । संकल्पितेतरवरा दौःशील्यं स्त्री यथा गता ॥ ६८ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस प्रकार चिति का चलस्वभाव उपाधि-प्रयुक्त है, उसी प्रकार उसका भेद भी उपाधि प्रयुक्त ही है, उस आशय से कहते हैं। भद्र, जैसे सुन्दर शीलवाली स्त्री स्वप्न में दूसरे उपपति से युक्त होकर दुःखस्वभाववाली होती हुई अन्य-सी प्रतीत होती है, वैसे ही वह चिति ही “हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि" इत्यादि श्रुतिप्रदर्शित संकल्प से अपनी आत्मा को ही जीवात्मा समझती हुई भीतर स्वयं अन्य-सी होकर अवस्थित हे