Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 74
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 74 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 74
संस्कृत श्लोक
संकल्पिताऽप्रबोधेन जाड्याऽविश्वप्रबोधिनी ।
शबलं रूपमासाद्य संकल्पाद्यात्यनारतम् ॥ ७४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्मचिति ही अज्ञानयुक्त स्वरूप की
प्राप्ति कर देह ओर जीव के आकार से संकल्पित होकर अज्ञानप्रयुक्त जड़तावश असर्वज्ञ हो जाती हे ।
तदनन्तर बार-बार भोगों के संकल्पो से निरन्तर संसारभागिनी होती हे