Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 97
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 97 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 97
संस्कृत श्लोक
क्वचित्फलावलीपाकैः क्वचित्काष्ठानलादिभिः ।
क्वचिच्छैत्यहिमद्वारि क्वचित्खादि न किंचन ॥ ९७ ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर फलपंक्तियों के पाकों से उपलक्षित रहती है, कीं काठ, अनल आदि से उपलक्षित रहती है,
कहीं पर शीततावश हिम के सदुश आचरण कर रहे जल से युक्त रहती है ओर कहीं आकाश ओर वायु
बनकर रहती है ओर कहीं अन्यरूप बनकर रहती है