Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 109
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 109 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 109
संस्कृत श्लोक
जडगतेरवलोकय शक्ततां निजपदस्मरणेन विनेह चित् ।
व्रजति कष्टमधः पतनाय या यदरघट्टघटीघनपीठवत् ॥ १०९ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, जडगति अविद्या की
सामर्थ्य तो देखो ! जिससे कि पूर्णब्रह्मस्वभाव होती हुई भी शरीरावच्छिन्न चिति अपनी निरतिशयानन्द
श्लोक से किया गया है । अथवा नारायण आदि सारूप्य मुक्त जीवों के विषय में, इसकी योजना
करनी चाहिए । अथवा यहाँ से लेकर जीवगतियों का निरूपण नहीं किया गया है, किन्तु चिति सब
कुछ व्यापार करती है, यह कहा गया है इसलिए कोई दोष नहीं है ।
पूर्णस्वभावता का स्मरण किये बिना मैं शरीरमात्र परिच्छिन्न हूँ, थोड़ा पुण्य क्षीण होने पर मैं न्यून हो
गई, यों समझकर अपने पतन के लिए उस प्रकार नीचे की ओर गिरती जाती है, जिस प्रकार मेघ, समुद्र
आदि से उपलक्षित समस्त जगत को अपने उदर में समा लेने की सामर्थ्य से युक्त होते हुए भी रहट की
घरियों में प्रविष्ट आकाश अपने उक्त स्वभाव का स्मरण किये बिना घटीमात्र से परिच्छिन्न तथा अल्प
जल गिरने सेमे खाली हो गया, यों मानकर बार-बार अपने पतन के लिए नीचे की ओर गिरता जाता है,
यह बड़ा कष्ट हे