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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

दिक्कालाद्यनवच्छिन्नः सर्वारम्भप्रकाशकृत् । चिन्मात्रमूर्तिरमलो देव इत्युच्यते मुने ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मदेव तो पूजा ओर फल दोनो अवस्थाओं में नित्य, निरतिशय, परमार्थसत्य पूणनिन्द स्वभाव ही है। इसलिए वही देव“ यो कहने योग्य है, ऐसा कहते है । हे मुने, दिकृकृत, कालकृत आदि परिच्छेदो से शून्य, समस्त घटादि कार्यो का प्रकाश करनेवाला, निर्मल चैतन्यमात्रस्वरूप परब्रह्म ही देव कहा जाता है