Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
श्रृण्वङ्ग स्वाङ्गशाखोऽपि कुन्तलालिलतोऽप्यलम् ।
चिन्मज्जनं विना देहवृक्षः क इव राजते ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे भद्र, सुनो !
यद्यपि इस देहरूपी वृक्ष में हाथ, पैर आदि अपने अंग ही शाखाएँ हैं और केशों का समूह ही सुन्दर
लताओं का समूह है; तथापि यह वृक्ष क्या पर्याप्तरूप से चैतन्य सम्बन्ध के विना किसी तरह शोभित हो
सकता हे ?