Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
पादपाण्यादिमानन्यो यो वा देवः प्रकल्प्यते ।
संविन्मात्रादृते ब्रह्मन्किंसारः किल कथ्यताम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार करने पर सम्पूर्ण देवताओं का सारभूत होने से वही देव है, यों कहते है ।
ब्रह्मन्, हाथ, पैर आदि से युक्त जिस किसी अन्य देवता की कल्पना की जाती है, वह
संविन्मात्रस्वरूपता का परित्याग कर दूसरी कौन-सी सारभूत वस्तु हो सकती है, इसे आप
कहिए