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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 87

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 87 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 87

संस्कृत श्लोक

क्रमादाबद्धवैदग्ध्याद्वैदग्ध्याङ्गमुपागता । विचित्रबन्धनिर्माणपराक्रमपदं गता ॥ ८७ ॥

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर क्रमशः मनुष्य शरीर का लाभ होने पर भी बाल्यकाल से लेकर व्यवहार निपुणता के अभ्यास से प्राप्त कौशल द्वारा काव्य, नाटक, तर्क आदि के अभ्यास में तत्पर हुई यह चिति अपने बन्धन के (धन, घर, खेत, परिवार आदि के) निर्माण में अपेक्षित पराक्रम के ही पद को प्राप्त होती हे, मोक्षोपयोगी विवेक- पद को प्राप्त नहीं होती