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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 5–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

अव्युत्पन्नधियो ये हि बालपेलवचेतसः । कृत्रिमार्चामयं तेषां देवार्चनमुदाहृतम् ॥ ५ ॥ शमबोधाद्यभावे हि पुष्पाद्यैर्वार्चयन्ति हि । मिथ्यैव कल्पितैरेवमाकारे कल्पितात्मके ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

मूर्ति आदिरूप साकार देव की अर्चना में कौन अधिकारी हैं ? इस प्रश्न पर उसके (मूर्तिरूपः देवतार्चन के) अधिकारी बतलाते हैं। जो विवेक-बुद्धि से सम्पन्न नहीं है तथा जो बालकों के सदृश कोमलचित्तवाले हैं, उन्हीं के लिए कृत्रिम प्रतिमा-प्रचुर देवार्चन का विधान किया गया है