Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
महासत्तास्वभावेन सर्वत्र समतां गतम् ।
महाचिदिति संप्रोक्तं परमार्थ इति श्रुतम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
त्रिकाल अबाधित सर्वानुगत सत्त्व-स्वभाव से
उसने सर्वत्र समरूपता प्राप्त की है, वह महाचैतन्य (प्रकाशकों का भी प्रकाशक) यों कहा जाता है
और वही सबसे ऊँचा प्रयोजन है, यों श्रुतियों मेँ प्रतिपादित हे