Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 72
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 72 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
देशकालविभागान्ता तन्मात्रवलिता क्रमात् ।
जीवो भूत्वा भवत्याशु बुद्धिः पश्चादहं मनः ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
उस प्रकार की चिति में पंचीकरण प्रयुक्त स्थूलभूतात्मक समष्टि-व्यष्टि-स्थूल-देहरूपता, उसके
अन्दर रहनेवाले लिगदेह में जीवरूपता तथा उसमें बुद्ध्यात्मरूपता का अवलोकन कराते है ।
पंचीकरण द्वारा सूक्ष्म भूतों से वेष्टित होती हुई क्रमशः यह चिति सातं द्वीप तथा चौहद लोकरूप
देश विभाग एवं निमेष से लेकर दो परार्धपर्यन्त कालविभाग से युक्त हो जाती है । तदनन्तर वह प्राणधारण
से जीवरूप होती हुई तत्काल ही बुद्धि, अहंकार, मन और चित्तस्वरूप हो जाती है