Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
स्वसंकल्पकृतैः कृत्वा क्रमैरर्चनमादृताः ।
बालाः संतोषमायान्ति पुष्पधूपलवार्चनैः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त कृत्रिम प्रतिमा-प्रचुर देवार्चन उत्तम चावल न मिलने पर कोदो खाने के समान है, ऐसा
कहते हैं ।
वे अव्युत्पन्नमति बालक शम ओर आत्मज्ञान के अभाव में मिथ्यारूप ही कल्पित पुष्प आदि से
कल्पितस्वरूप उस प्रकार की प्रतिमा आदि की पूजा करते हैं ॥|६॥ वे बालक आदरपूर्वक अपने संकल्प
से रचित स्वल्प पुष्प, धूप आदि सामग्रीरूप उपायों से पूजनकर सन्तोष प्राप्त करते हैं