Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
निरिच्छस्वस्वभावेन वसन्तेन यथाङ्कुरः ।
तन्यते तद्वदेवेयं जगल्लक्ष्मीश्चिदात्मना ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
तव क्या चैतन्य अपने भोग की इच्छा से जगत-सृष्टि करता है, इस प्रश्न पर नहीं” ऐसा उत्तर
देते हैं ।
जिस प्रकार अपने इच्छाशून्य स्वभाव से युक्त वसन्त ऋतु द्वारा अंकुर विस्तारित होता है, उसी
प्रकार (2) इच्छाशून्य स्वभाववाले इस चिदात्मा द्वारा यह जगत की शोभा विस्तारित होती है