Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
शरीरावसथायां च चलायां तत्प्रसादतः ।
सोऽस्यां गहनकोशायां ह्रद्गुहायां गुहेश्वरः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनीश्वर, वही इन चित्र-विचित्र चेष्टाओं
से युक्त, उसीके कारण चेतनावाली तथा उसीके स्वरूप से निबद्ध इस शरीररूपी नगरी में निवास
करता है, इस विषय में प्रमाणतया यह श्रुति भी है - “स एष इह प्रविष्ट आनखग्रेभ्यः“ ॥२ ३॥ शरीररूपी
बड़े घर से युक्त उसके प्रसाद से संचरणशील तथा दुर्विज्ञेय अन्नमय आदि बहि:कोशों से समन्वित इस
बुद्धिरूप गुहा में वही गुहेश्वर यानी आनन्दमयकोशरूप गुहा का ईश्वर होकर स्थित हे