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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 54

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 54 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 54

संस्कृत श्लोक

चित्सर्वं जगदारम्भमिमं प्रकटयत्यलम् । त्रैलोक्यदीपकशिखादीपो वर्णाश्रयं यथा ॥ ५४ ॥

हिन्दी अर्थ

त्रैलोक्य के प्रकाशन के लिए दीपक की शिखारूप यह चिति ही इस समस्त जगत के कार्यों को उस तरह भलीभाँति प्रकाशित करती है, जिस तरह प्रसिद्ध दीपक रूपवान द्रव्य को प्रकाशित करता है