Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verse 46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verse 46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
विचित्रालोककुसुमा घनसंकल्पपल्लवा ।
व्योमकेदारिकारूढा सत्तौघफलशालिनी ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
अव उसी विति का लतारूप से वर्णन करते हैं।
मायाकाशरूपी क्यारी में उत्पन्न हिरण्यगर्भ रूप से अंकुरित, घनीभूत संकल्परूपी पल्लवो से
युक्त चित्र-विचित्र आलोकरूपी फूलों से सुशोभित और समस्त पदार्थो में सत्यस्वरूपतारूप फल
देनेवाली यह चिति ही एक तरह की लता है