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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 28–31

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 28-31

संस्कृत श्लोक

चारवो ये चमत्काराश्चितश्चिति यथास्थितम् । चमत्कुर्वन्ति किल ते तेन केचिन्नभोभिधाः ॥ २८ ॥ केचिज्जीवाभिधानाश्च केचिच्चित्ताभिधानकाः । केचित्कलाभिधानाश्च केचिद्देशाभिधानकाः ॥ २९ ॥ केचित्क्रियाभिधानाश्च केचिद्रव्याभिधानकाः । केचिद्भावविकारादिजात्यौचित्याभिधानकाः ॥ ३० ॥ प्रकाशाभिधानाः केचित्केचिच्छैलतमोभिधाः । अर्केन्द्राद्यभिधाः केचित्केचिद्यक्षाभिधानकाः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

चैतन्य के जो सुन्दर चमत्कार (आरोप्य में सत्तास्फूर्तिप्रदान रूप) है, वे चैतन्य में मायाशबल द्वारा पहले के काम, कर्म और वासना के अनुसार जो कोई अवस्थित हैं, उनका आविर्भाव करते हे । (उन चित्‌ चमत्कारो का ही कल्पना से नामोल्लेख करते है /) इसलिए उन चमत्कारो में कोई तो आकाश नामवाले हैं, कोई जीव नामवाले हैं कोई चित्त नामवाले हैं, कोई कला नामवाले हैं, कोई देश नामवाले हैं, कोई क्रिया नामवाले हैं, कोई द्रव्य नामवाले हैं और कोई यास्कमुनि द्वारा उक्त “जायते, अस्ति, वर्धति आदि भावविकार तथा विभिन्न गुणों की जाति के वैचित्र्य ओर ओचित्य से अन्यान्य चित्र-विचित्र नामवाले हैं, कोई प्रकाश नामवाले हैं, कोई पर्वत, अन्धकार आदि नामवाले हँ, कोई सूर्य, इन्द्र आदि नामवाले हैं तो कोई यक्ष नामवाले हैं