Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, Verses 77–83
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 30, verses 77–83 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 30 · श्लोक 77-83
संस्कृत श्लोक
मोहमान्द्यमुपायाता तृष्णानिगडपीडिता ।
कामक्रोधभयोपेता भावाभावातिपातिनी ॥ ७७ ॥
त्यक्तानन्तनिजाभोगा व्यवच्छेदविकारिणी ।
दुःखदावानलातप्ता शोकाशिवकृशाशया ॥ ७८ ॥
इयमस्मीति भावेन शून्येन विकलीकृता ।
देहमात्रगृहीतास्था परं दैन्यमुपागता ॥ ७९ ॥
मग्ना मोहमहापङ्के जीर्णेव वनदन्तिनी ।
भावाभावलतादोला परिलोलशरीरका ॥ ८० ॥
असारापारसंसारविकारव्यवहारिणी ।
तापोपतप्तहृदया रागतेजोनुरञ्जिता ॥ ८१ ॥
निजयूथपरिभ्रष्टा मृगीवावशतां गता ।
आविर्भावोदिताकारा तिरोभावेऽस्तमागता ॥ ८२ ॥
स्वसंकल्पोपयातासु भीता संभ्रमदृष्टिषु ।
पलायते वाष्वन्यासु वेतालेष्विव बालिका ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
तदनन्तर मोहरूपी मन्दता को प्राप्त हुई, तृष्णारूपी हथकडी पड़ने के कारण
पीडित हुई, काम, क्रोध एवं भय से ग्रस्त, वैभव और दरिद्रतारूपी गर्तो में स्वयं गिरी हुई, अपने असीम
विस्तृत स्वरूप का परित्याग कर देनेवाली, रत्री, पुत्र आदि के वियोगो मे शोक आदि विकारों से ग्रस्त
हुई, दुःखरूपी दावानल से निरन्तर सन्तप्त हुई, शोक ओर अशुभं से कृपण हुई, "प्रत्यक्ष दुःख, मोह
आदि स्वभाववाली ही में हूँ। - इस शून्यात्मक भ्रम से व्याकुल हुई, एकमात्र देह मेँ आस्था रखनेवाली
महान दीनता को प्राप्त हुई, मोहरूपी महाकीचड में जीर्णं जंगली हथिनी की नाई फँसी हुई, वैभव और
दरिद्रतारूपी लता-हिंडोलों से चारों ओर चंचल शरीरवाली, निःसार और असीम संसार के विकारों में
व्यवहार करनेवाली, अनेक प्रकार के तापो से सन्तप्त हृदयवाली, राग और क्रोध से निरन्तर व्याप्त
हुई, अपने झुण्ड से बिछुड़ी हुई हिरनी के सदृश परवश हुई, वैभवों या भूतमात्राओं के आविर्भावकाल में
हृष्ट या अभिव्यक्त हुई और उनके तिरोभाव में दीनता या तिरोभाव को प्राप्त हुई, अपने संकल्प से
प्राप्त हुई अन्य विभ्रमदृष्टियो मे भयभीत होकर उस तरह भाग जाती है जिस तरह वेतालो के बीच से
बालिका भाग जाती है