Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 83
इक्यासीवाँ सर्ग समाप्त बयासीवाँ सर्ग आत्मा की एकाग्रता की सिद्धि के लिए निरर्थक चेष्टादि हेतुओं से देह, इन्द्रिय ओर मन को वीतहव्य के द्वारा बोधन ।
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- Verse 1पूर्व में किया गया विचार साम्प्रदायिक है, इसे बतलाते है । महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्र…
- Verse 2हे श्रीरामचन्द्रजी, विचारप्रचुर बुद्धि से इसी दृष्टि का अवलम्बन कर आप इस संसारसागर के उत्…
- Verse 3हे श्रीरामजी, अब आप इस दूसरी इन्द्रिय ओर मन की बोधरूपिणी दृष्टि का श्रवण कीजिए, जो परमपद…
- Verse 4पहले महान् तेजस्वी वीतहव्य मुनि अरण्य मेँ समाधि के लिए अनुकूल विन्ध्य पर्वत की विस्तृत ग…
- Verse 5वीतहव्य को समाधि की इच्छा कैसे हुई इसे कहते है। किसी समय की बात हे कि संसाररूपी भ्रम को द…
- Verse 6केवल निर्विकल्प समाधि से प्राप्त होनेवाले उदार परब्रह्म को जानने की इच्छा से ही उक्त महाम…
- Verse 7उसके बाद जैसे भ्रमर नीलकमल में प्रवेश करता है, वैसे ही महामुनि वीतहव्य ने कदली पत्रो से व…
- Verse 8महामुनि वीतहव्य नें उस पर्णकुटी में अपने द्वारा बिछाये गये सम और शुद्ध मृगचर्म के आसन के…
- Verse 9पद्मासन बोधकर, पैर के तलवों के मूल के ऊपरी भाग पर हाथ की अँगुलियों को रखकर तथा अपनी ग्रीव…
- Verse 10जैसे सायंकाल के समय मेरुपर्वत की कन्दरा मे प्रवेश कर रहा भानु अपनी दीप्तिकिरणों का अपने म…
- Verse 11तदनन्तर बाह्य ओर आभ्यन्तर स्पर्शो का यानी बाह्य इन्द्रियों के तथा भीतरी मन के विषयरूपी स्…
- Verse 12अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि यह मन इतना चंचल हे । क्षणमात्र के लिए किसी एक निश्चित विषय म…
- Verse 13निरंकुश चक्षुआदि इन्द्रियों से सम्बद्ध संभ्रमरूप अनेकविध विषयस्वरूपों को लेकर मन निरन्तर…
- Verse 14इन्द्रियों केद्वारा वर्धित मन पूर्व पूर्व वृत्तियों का त्याग करते ही उत्तरोत्तर तदनुसारिण…
- Verse 15मन घट से पट के ऊपर ओर पट से उत्कट शकट के ऊपर कूद जाता है यों यह चित्त अर्थो के ऊपर उस प्र…
- Verse 16यों चित्त के दोषो की समालोचना करके मुनि वीतहव्य ने उसके निर्गमन के द्वारो की समालोचना की,…
- Verse 17अब इन्द्रियो को ही भत्सनापूर्वक बोधन करते हैं। सागर के तरंगों की नाई अतिचंचल हे हतभाग्य इ…
- Verse 18हे चंचल स्वभाववाले इन्द्रियगण, अब तुम लोग अनर्थ के लिए चंचलता मत करो, अपने दुःखदायक भूतका…
- Verse 19हे इन्द्रियगण, तुम लोग मन ही के अलग-अलग द्वार के रूपों मेँ कल्पित हो, अतएव निश्चित अधम ओर…
- Verse 20अनृत (असत्य) स्वरूपवाले आप लोगों की दुर्विनय से आत्मज्ञानशून्य कुमार्ग मे जो प्रवृत्ति है…
- Verse 21यदि हम लोग जड़ हैं, तो कौन दर्शन आदि से सब व्यवहारो को करता है 2 इस पर कहते हैं। चिदात्मा…
- Verse 22हे चक्षुआदि इन्द्रियगण, सत्य स्वरूप से विरहित तुम लोग मेरे प्रति मिथ्या ही गरज रहे हो, तु…
- Verse 23जिस सर्वावभासक साक्षीस्वरूप प्रत्यगात्मा ने चक्षु आदि इन्द्रियों के स्वरूप का भली प्रकार…
- Verse 24जैसे सर्पो से डरा हुआ पथिक उनसे दूर रहता है चाण्डालो से डरा हुआ ब्राह्मण चाण्डालो से दुर…
- Verse 25तब क्यो इन्द्रियो के व्यापारो मे आत्मा की कारणता प्रसिद्ध है, इस पर कहते है । हे इन्द्रिय…
- Verse 26अव ललकार कर चित्त को प्रबुद्ध करते है । हे चित्तरूपी चारण (इन्द्रियों की बहिर्मुखता के प्…
- Verse 27हे शठ, “मे चेतनधर्मा हूँ” इस प्रकार की तुम्हारी वासनारूपी भ्रान्ति मिथ्या ओर निरर्थक है,…
- Verse 28हे चित्त, “मैं ही जीता हूँ” इस प्रकार की यह तुम्हारी अहंकाररूपी दुर्बुद्धि दुःख के लिए मि…
- Verse 29हे चित्त, अहंकार का यानी अभिमानरूप तुम्हारे परिणाम का जब आविर्भाव होता है, तब “कार्य- कार…
- Verse 30जब तुम्हारा स्वरूप ही दुर्लभ है, तब तुम्हारा अभिमान के द्वारा दूसरों की रक्षा करना तो दूर…
- Verse 31हे चित्त, दुःख का विषय है कि भोग के उत्तरक्षण में विषय में पर्यवसित होनेवाली और भोगकाल मे…
- Verse 32हे मूर्ख चित्त, चक्षु आदि इन्द्रिय -गणों का आश्रय लेकर तुम उपहास के पात्र मत होओ तुम न तो…
- Verse 33भोगानुभव की सामर्थ्य से वर्जित, जड एवं मिथ्याभूत तुम्हारी भोगाभिलाषा निरर्थक ही है, ऐसा क…
- Verse 34जो जडस्वरूप हे, उसका अस्तित्व हे ही नहीं । जैसे जपा कुसुम की लालिमा से स्फटिक में लालिमा…
- Verse 35जब ऐसी स्थिति है, तव मैं (चित्त) प्रत्यकृ-चेतनस्वरूप ही क्यो न कहा जाऊँ ? ऐसी आशंका होने…
- Verse 36निखिल विकल्पों का त्याग हो जाने पर तुम्हारी चित्तस्वरूपता हो नहीं सकती, यह भाव है। यदि तु…
- Verse 37हे चित्त, यह तुम अपने आप ही जडभूत हो, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं हे । भला बतलाओ तो सही, जड…
- Verse 38हे चित्त, यदि तुम यह कहो कि पत्थर की प्रतिमा किसी अन्य चेतन के व्यापार से नाच करती हुई दे…
- Verse 39जिसकी शक्ति से जो किया जाता है, वह उसी के द्वारा किया हुआ होगा । पुरुष की शक्ति से हँसुआ…
- Verses 40–41जिसकी शक्ति से जिसका हनन किया जाता है, वह उसी के द्वारा हत कहा जायेगा, पुरुष की शक्ति से…
- Verse 42जिसकी शक्ति से जो पिया जाता हे, वह उसी के द्वारा पिया गया कहा जायेगा, पात्र के द्वारा जल…
- Verse 43हे चित्त, आत्मारूपी परमात्मा ही निरन्तर तुम्हें चिदाभास-व्याप्ति से बोध प्रदान करते हैं,…
- Verse 44इसलिए बोधसत्ता के अधीन ही तुम्हारा नाम और रूप से स्वरूप-लाभ है, ऐसा कहते हैं। हे चित्त, च…
- Verse 45इस स्थिति मे हे चित्त, आत्मा ही अपने ज्ञान से तुम्हारे जैसा हुआ है ओर अपने ज्ञान से तुम्ह…
- Verse 46इससे तुम तत्त्व रहित हो, तुम मूढ हो ओर परमार्थ दशा में तुम्हारा अस्तित्व ही नहीं है । इसल…
- Verse 47एेन्द्रजालिक लता की नाई चित्त की कल्पना मिथ्या है । इस ब्रह्माण्ड में विज्ञान मात्ररवभाव…
- Verse 48ब्राह्मीशक्ति से यानी चितिशक्ति से युक्त माया ही मनुष्य, देवता ओर समस्त जगत्रूपों से आविर…
- Verse 49हे मूढ यदि तुम आत्मतत्त्व के परिज्ञान से चिन्मय हो जाओगे, तो चिद्भेद सम्पादक कारण के न रह…
- Verse 50उस समय अप्राप्त विषयों का अभाव होने के कारण विषयशून्य शोक की संभावना हैं नहीं है, इस आशय…
- Verse 51हे चित्त, इस समय ब्रह्म से न तो तुम पृथक् हो और न देह ही पृथक है, किन्तु व्यापक एवं प्रक…
- Verses 52–53कहे गये दोनों कल्पो को फिर स्पष्ट कहते हैं। हे चित्त, तुम यदि आत्मस्वरूप हो जाओगे, तो तत्…
- Verse 54हे चित्त, मैं बाल शरीर हूँ, मैं वृद्ध शरीर हूँ, बाल शरीर के सम्बन्धी क्रीड़ा के उपकरण आदि…
- Verse 55तब चित् और अचित् से पथक् तृतीय स्वरूपवाला ही मैं क्यो न होऊँ, तो इस पर कहते हैं। हे शठ…
- Verse 56तब मेरा तात्विक स्वरूप क्या है ? ऐसी चित्त की आशंका होने पर (अन्तिम आत्मसाक्षात्कारात्मक…
- Verse 57हे मूढ, इस कारण तुम्हारे में न तो कर्तृत्व हे ओर न भोक्तृत्व ही है तुम उक्त परब्रह्मस्वरू…
- Verse 58यदि मैं आत्मस्वरूप ही हूँ, तो (मनसैवानुद्रष्टव्यम्“ (मन से ही आत्मा का साक्षात्कार करना…
- Verse 59यदि तुम करणों का स्वभाव ही अपना स्वभाव मानते हो, तो चलने में भी तुम्हारी स्वतः सामर्थ्य न…
- Verse 60कर्ता के द्वारा अधिष्ठित न हुए इस करण में किसी प्रकार की शक्ति नहीं रह सकती, काटनेवाला यद…
- Verse 61हे चित्त, खड्ग प्रहार और तदुत्तरभावी छेदन क्रिया के लिए पुरुष में ही शक्ति है। अत्यन्त जड…
- Verse 62हे मित्र, तुम कर्ता नहीं हो, इसलिए निरर्थक दुःखभागी मत होओ । हे मूर्ख, पामर के सदृश प्रकृ…
- Verse 63यदि शंका हो कि मोह से जीवरूपता को प्राप्त हए अशनाया आदि से पीड्यमान ईश्वर की मैं उपेक्षा…
- Verse 64हे चित्त, कार्यकरणसंघात के अभिमान से “इस आत्मा का मैं उपकार करता हूँ” इस भ्रम से तुम परिच…
- Verse 65अतः परिशेष से इश्वर के लिए ही तुम्हे प्रवृत्ति कहनी चाहिए, पर उसका तो उत्तर कहा ही गया है…
- Verse 66परमात्मा परिपूर्ण और अद्वितीय है, अतः उसको इच्छा नहीं हो सकती, ऐसा कहते हैं। स्वभावतः प्र…
- Verse 67समस्त जगत् की परमात्मा ने ही अपने स्वरूप में कल्पना की है, अतः कोई वस्तु अलभ्य न होने से…
- Verse 68यदि सभी कुछ ईश्वर का ही है, तो उसमें मेरी इच्छा कैसे हुई ? इस पर कहते हैं। हे चित्त, तुम्…
- Verse 69तब उस परमात्मा के ही साथ सम्बन्ध स्थापन कर मैं उसके अनुग्रह से भोगो को प्राप्त करूँगा। इस…
- Verse 70सम्बन्ध की अयोग्यता का उपपादन करने के लिए मुख्य सम्बन्ध का लक्षण कहते हैं । हे चित्त, एक…
- Verse 71हे चित्त, तुम उक्त मुख्य सम्बन्ध में हेतु नहीं हो यानी मुख्य सम्बन्ध के लिए अयोग्य हो, क्…
- Verse 72जो सम हैं, उनका यानी क्षीर और क्षीर का, जो अर्धसम हैं, उनका यानी क्षीर ओर नीर का भी परस्प…
- Verse 73यदि शंका हो कि शब्द, स्पर्श, रूप आदि परस्पर विरुद्ध गुणवाले भी सूक्ष्म भूतो का पंचीकरण द्…
- Verse 74अथवा आत्मज्ञान से तुम्हारे जैसे दुःखप्रद दृश्यों का उच्छेद हो जाने पर दुःखशून्य निरतिशय आ…
- Verse 75तुमको समाधि मेही सुख है, न कि संकल्योन्मुखता में, क्योकि शिला के ऊपर गिरा हुआ झरने का जल…
- Verse 76यदि शंका हो कि मैं संकल्प नहीं करता, किन्तु करतृत्वस्वभाव से आत्मा ही संकल्प करता है, तो…
- Verse 77जैसे आकाश में हाथ, पैर आदि अंग हो ही नहीं सकते, वैसे ही आत्मा में कर्तृत्व हो ही नहीं सकत…
- Verse 78जैसे समुद्र अपने अन्दर जलस्वरूप फेन, बुद्बुद् ओर तरंगों से स्फुरित होता हे, वैसे ही आभास…
- Verses 79–80जैसे समुद्र मे तप्त अंगार नहीं रह सकता, वैसे ही आत्मा में दूसरी कोई कल्पना ही नहीं रह सकत…
- Verse 81हे चित्त, जैसे आकाश में अरण्य नहीं है, वैसे ही पूर्वोक्त सत् कल्पनाएँ आत्मा में हैं ही न…
- Verse 82हे चित्त, अनादि रूपवर्जित, सर्वगामी ओर व्यापक आत्मा में कल्पनाओं का कौन आरोप कर सकता है ?…
- Verse 83हे चित्त, अपने निर्मल स्वभाव से तुमने जब असंदिग्ध और प्रत्यक्ष रूप से यह जान लिया कि वस्त…