Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
चित्तेन्द्रियेश्वर स्वस्ति भवते त्वन्तमागतः ।
नित्यं पूर्वमभूताय नास्तिरूपाय संप्रति ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसकी शक्ति से जो पिया जाता हे, वह उसी
के द्वारा पिया गया कहा जायेगा, पात्र के द्वारा जल आदि पिये जाते हैं, पर जो मनुष्य है, वही पीनेवाला
कहा जाता हे, पात्र नहीं ॥४ १॥ हे मेरे प्यारे चित्त, तुम स्वभाव से ही जड हो, पर उसी सर्वज्ञ साक्षी के
द्वारा बोधित होते हो, क्योंकि आत्मा ही अपना अपने से भोक्ता, भोग्य, कारण, उपकारण आदि जगत्
के रूप से स्वप्न की नाई सर्जन करता हे