Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 73
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि शब्द, स्पर्श, रूप आदि परस्पर विरुद्ध गुणवाले भी सूक्ष्म भूतो का पंचीकरण
द्वारा जैसे सम्बन्ध होता है, वैसे ही मेरा आत्मा के साथ सम्बन्ध क्यो नहीं होगा ? तो इस पर कहते हैं।
शब्द, स्पर्श आदि विरुद्ध गुणवान् पदार्थों में परस्पर विरुद्धता नहीं है, क्योंकि दूसरे द्रव्यों के गुण
भी परस्पर मेल मे पंचीकृत द्रव्यो का आश्रय करते हैँ |
जैसे कहा है :
शब्दैकगुणमाकाशं शब्दस्पर्शगुणो मरूत् । शब्दस्पर्शरूपगुणैस्त्रियुणं तेज उच्यते ॥
शब्दस्पर्शरूपरसगुणैरापश्चतुर्गुणा: । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धै: पंचगुणा मही ॥
आकाश केवल शब्द गुणवाला है, वायु शब्द और स्पर्श गुणवाला है, तेज शब्द, स्पर्श और रूप -
इन तीन गुणों से तीन गुणवाला कहा जाता है, जल शब्द, स्पर्श, रूप और रस इन चार गुणों से युक्त है
और पृथ्वी शब्द, स्पर्श, रूप, रस ओर गन्ध इन पाँच गुणों से युक्त हे । प्रकृत में संवित् ओर जडता का
विरोध होने से जड़रूप तुम्हारे द्वारा यदि संवित् च्युत हो जायेगी तो साधक के भाव से जड़ अंश सिद्ध
ही नहीं होगा, ऐसी स्थिति में तुम्हारी ही असिद्धि का प्रसंगरूप दुःख प्राप्त हो जायेगा । यदि संवित् के
द्वारा तुम च्युत हो जाओगे तो तुमने अपने ही विनाश के लिए आत्मसम्बन्ध की इच्छा की, यह प्राप्त
होगा । इसलिए आत्मा के साथ सम्बन्ध चाहनेवाले तुम दोनों प्रकार से भी संवित् से च्युत न हो, यह
तात्पर्य है