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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

पतन्त्यहमहमिकाविहितान्योन्यचिन्तिताः । कुतोऽपि दुःखावलयो धारा आसारगा इव ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

उसके बाद जैसे भ्रमर नीलकमल में प्रवेश करता है, वैसे ही महामुनि वीतहव्य ने कदली पत्रो से विनिर्मित अपनी पर्णकुटी में प्रवेश किया, जिसमें कदली द्वारा श्वेत कपूर की रचना की गयी थी अतएव जो सुगन्ध से पूर्ण थी