Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, Verse 36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 83, verse 36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 83 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
द्वन्द्वं चाद्यन्तसंकल्पक्षीणं क्षयि भव स्थितम् ।
इदानीमुदितं नित्यं स्वप्राग्रूपे क्षयं गते ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
निखिल विकल्पों का त्याग हो जाने पर तुम्हारी चित्तस्वरूपता हो नहीं सकती, यह भाव है। यदि तुम
अपने को अचेतनरूप मानोगे, तो अनायास ही कर्तृत्व आदि का परिमार्जन कर सकते हो, यह कहते हैं।
हे चित्त, तुमने जिस रीति से जिन मिथ्या कर्तापन ओर भोक्तापन दोनों को जान लिया है, उनका
भें युक्ति से किस प्रकार परिमार्जन कर देता हूँ, उसे धीरे से सुनो